सीत और बसन्त by Mahesh Ramjeeawon

यह कहानी दो शिशुओं पर आधारित है । एक का नाम था सीत और दूसरे का बसन्त । दोनों भाई और बहन थे । एक समय की बात है । एक राजकुमार बड़े धूम-धाम से मनाया गया । दान-पुन से नगरवासी बहुत प्रसन्न थे । न कोई भूखा और न कोई प्यासा था । वहाँ हर प्रकार की सुख-सुविधा थी। किन्तु महल में कोई खुशहाली न थी । रानी की गोद बरसों बाद भी भारी न हुई । प्रजा से राजा का दुख देखा न गया । उनके अनुरोध पर राजा ने दूसरी शादी की, फिर भी राजा की आस पूरी न हुई । वंश और कूल को बढ़ाने के लिए राजा ने सात शादियाँ कीं । तब जाकर सातवीं रानी से राजा की इच्छा दुगनी पूरी हो गई । रानी ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया । रानी के दो बच्चे जैसे हीरे के दो टुकड़े थे । राजा के दोनों कलेजे के टुकड़े थे । रानी भी राजा से अपार प्रेम करते थे । परन्तु उन छ: रानियों से उनका सुख देखा न गया । ऐसा लगता था जैसे उनके कलेजे में साँप लोट रहा हो । छ: रानियों को कलियों का खिलना रास न आया । एक दूसरे से सलाह कर, उन्होंने एक व्यक्ति को स्वर्णमुद्राएँ और माला का लोभ दिया । वह व्यक्ति बच्चों को जंगल में ले गया और वहीं उनकी हत्या कर ज़मीन में उनकी लाश गाड़ दी । मृत्यु शैया के पास घाटी से दो कमल फूल खिलते हैं । उन फूलों पर सबसे पहले एक लकड़हारे की दृष्टि पड़ती है । वह उन फूलों को तोड़कर राजा को भेंट करना चाहता था । किन्तु ज्योंही वह फूल तोड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाता, फूल अदृश्य हो जाता । वह राजा के पास जाकर इस अद्भूत घटना का वर्णन करता है । किसी को भी इस बात का विश्वास नहीं होता । जादू के फूल तोड़ने केलिए पहले मंत्री गया, फिर सेनापति । उनके पास जाते ही फूल डाले पाते आकाश में लग जाते । वे दोनों पुष्प और कोई न था, वे सीत और बसन्त थे । उन्हें अपनी माँ का इन्तज़ार था । राजा ने उनकी माँ को गलत समझकर त्याग दिया था इसलिए राजा उनकी नज़रों में राजा दोषी थे । जब सभी असमर्थ होकर लौटे तो राजा ने राज ज्योतिष को भेजा । ज्योतिष बड़ा अहंकारी था क्योंकि उनकी हर भविष्यवाणी सत्य प्रमाणित हुई थी । बच्चों ने उसका अभिमान तोड़ने की सोची । ज्योंही वह आगे बढ़ता, फूल आँखों से ओझल हो जाते । ज्योतिष क्रोधित होकर, तांत्रिक विद्या द्वारा फूलों को बन्दी बनाकर राजा के पास ले जाना चाहता था । तब सीत और बसन्त ने बताया कि जिस महाराज को वे वीर और प्रतापी मानते हैं, उन्होंने अपनी निर्दोष छोटी रानी को महल से निकाल दिया है । ज्योतिष राजा के पक्ष में कहते हैं कि रानी लापरवाही न करती तो बच्चे गायब न होते । तब सीत और बसन्त ज्योतिष को राजा की छहों रानियों के कुचक्र के बारे में बताते हैं । किस तरह वे छोटी रानी से ईर्ष्यावश बच्चों की हत्या करवाती हैं । ज्योतिष को जब पता चला कि जिस जगह वह खड़ा था, उन मासूम बच्चों की हत्या हुई थी तो उसे बड़ा दुख हुआ । पूरे राज्य की ओर से वह दोनों से क्षमा माँगता है । सीत और बसन्त अपनी माँ का पता जानने के लिए व्याकुल थे किन्तु किसी को भी पता न था कि रानी राजमहल से कहाँ गई । इधर महाराज को एक अद्भूत स्वप्न आता है जिसमें एक लड़का और एक लड़की उनसे कठोर स्वर में बातें कर रहे थे । वे राजा से कह रहे थे कि उन्हें न राजा का धर्म और न पिता का धर्म निभाना आता है । राजा को अपनी गलती का अहसास होता है । वे सोचने लगे , कहीं छोटी रानी के साथ धोखा तो नहीं हुआ । दूसरे दिन महल में माली भी आकर राजा से फूलों का अलौकिक वर्णन करता है । महाराज सभा बुलाकर उस गंभीर समस्या पर विचार करते हैं । ज्योतिष महाराज को सुझाव देते हैं कि महारानी को भेजना अत्युत्तम होगा क्योंकि स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से अपनापन होता है । सभासदों के परामर्श पर महारानी को जंगल भेजा गया । महारानी के दिल में खोट थी । फूलों के पास जाने पर उनका कठोर दिल काँपने लगी । डर कर वह वापस लौट आई । राजा बीमार पर गये । वे स्वयं जाने के लिए तैयार होते हैं । राज-रथ आते देख सीत और बसन्त आपस में बात करते हैं । सीत कहती है कि भाई-बहन का रिश्ता उन्हें कई जन्मों के पुण्य से मिला है । तब बसन्त को उस शाप की याद आती है जो एक ऋषि ने उनके भाई-बहन के प्यार को देख कर ईर्ष्यावश दिया था । शाप में उनकी हत्या होनी थी और उनकी माँ को अकारण दण्ड मिलना था । बाद में ऋषि को पछतावा हुआ था । उन्होंने कहा कि हमारी बिछड़ी हुई माँ मिल जायेगी ।

राजा जब समीप आते हैं तो उन अद्भूत और विशेष फूलों को देख प्रसन्न होते हैं । उन्हें भी फूल प्राप्त करने की इच्छा हुई । उन्हें तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाते ही वे विस्मयकारी ढंग से आकाश में उड़ जाते । राजा को अपनी गलती का अनुमान हो चुका था । फूलों के रहस्य को सुलझाने से पहले वे धर्ती से जाना नहीं चाहते थे इसलिए वे अपने राजमहल वापस लौट आये । ऋषि के शाप को टलने का समय आ चुका था । निर्दय रानियों के बुरे दिन आ गये थे । ज्योतिष महाराज से छोटी रानी की तलाश का निवेदन करते हैं । छोटी रानी को फूलों के पास भेजने से ही उनका रहस्य खुल सकता था । ढूंढने पर पता चला कि रानी सोनपुर ज़मीनदार के यहाँ कौआ हँकनी के रूप में काम कर रही है । उन्हें महल में लाया गया । रानी का दम महल में घुट रहा था । वह जंगल में लौट जाना चाहती थी । राजा अपना अपराध स्वीकार करते हैं । रानी अपने बच्चों की याद दिलाते हैं । तब रानी साधारण कपड़ों में जंगल की ओर प्रस्थान करती है । उन्हें सोना-चांदी, महल, राज-सम्मान का मोह न था । उन्हें सिर्फ सीत-बसन्त की चाह थी । वह नंगे - पांव दिल में आस लिए जंगल की ओर चल पड़ी । सीत और बसन्त माँ को आते देख खुश होकर उनके गले लगते हैं । रानी की ममता की जीत होती है । माँ से मिलने के बाद वे महल लौटना नहीं चाहते थे । माँ बताती है कि दुनिया को सच्चाई बताने के लिए उन्हें महल वापस जाना होगा । रानी को खुशी होती है जब महाराज सीत और बसन्त को पहचान लेते हैं । राजा के खुशी का ठिकाना न था । उन्होंने जो खोया था, पूरा पा लिया । छोटी रानी का दम महल में घुट रहा था । वह महाराज से आज्ञा मांगती है । महाराज छोटी रानी को राजमहल, राजगद्दी के उत्तराधिकारी का वास्ता देते हैं । बसन्त अपनी माँ के अलावा और कुछ नहीं चाहता था । महाराज हर तरह से प्रायश्चित करने के लिए तैयार थे । वे अपनी पत्नी और बच्चों से कहते हैं कि यदि वे चले गये तो महाराज आत्महत्या कर लेंगे । इस पर बच्चों का दिल पिघल जाता है । उनके मिलने पर चारों तरफ खुशियाली छा जाती है । महाराज हर प्राणी को जिन्होंने यह काण्ड रचा था, दण्ड देना चाहते थे । छोटी रानी उन सब को क्षमा दान देना चाहती थी । किन्तु महाराज के लिए वे क्षमा योग्य नहीं थे । राजा उन्हें ऐसी सज़ा दिलाना चाहते थे जिससे देखने और सुनने वालों का दिल दहल जाए । वे राज्य के हर प्राणी को सुखी देखना चाहते थे । सबका साथ पाकर महाराज राज ज्योतिष द्वारा गायक बुलवाते है और खुशी के गीत से पूरा वातावरण गूंज उठता है ।


मॉरीशस का हिन्दी रंगमंच : नये क्षितिज की तलाश by Shree Mahesh Ramjeeawon

मॉरिशसीय रंगमंच, स्वतन्त्रता के बाद एक नई दिशा और नये मोड़ से होते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर हुआ हैं । उससे पहले रंगमंच मुट्ठी भर सामन्तवाद बुर्जुआ लोगों की जकड़ में मनोरंजन का साधन था । त्रफालगर हॉल, प्लाज़ा या पोर्ट लुई रंगमंचों के उपयोग विदेशी या बुर्जुआ मालिकों की धरोहर के रूप में था जिसका सम्बन्ध आम आदमी से नहीं के बराबर था । आज़ादी के बाद कला और संस्कृति की दिशा में चेतना जागी । १९७३ से जब से सत्ता ने रंगमंच को आश्रय दिया तब से हज़ारों की संख्या में युवा वर्ग इस दिशा में रूचि ले रहे हैं ।

रंगमंच समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि इतिहास व जीवन की तन्द्रायात्रा समाप्त करके आदमी को अपनी पहचान और परिवर्तन के लिए बाध्य करता है । आज के राजनितिक और सांस्कृतिक असंतुलन में आदमी जहाँ विज्ञान और औद्योगीकरण की आपाधापी में अपने को कठपुतला बनाते जा रहा है वहाँ रंगमंच जैसा सशक्त माध्यम शब्दों को पीछे कर कथ्य को सामर्थ्य दे सकता है । रंगमंच ही राजनितिक सन्तुलन के साथ साहित्य संस्कृति और कला को नई शक्ति और आयाम प्रदान कर सकता है । इस स्थिति में रंगकर्मियों को पूरे दायित्व के साथ जनता में युगबोध और आत्मबोध के प्रश्न करके उनके प्रश्नों के उत्तर दे कर स्वस्थ संस्कृति और समाज के निर्माण की अगुवाई भी करना है । रंगमंच के अस्तित्व को पहचानकर नाटककारों को अपने परिवेश से बाहर रंगमंच के हर शिल्प व तकनीकी साधनों का ज्ञान ज़रूरी है ।

रंगमंच : लोक मंच से राष्ट्रीय मंच तक

जिन परिस्थितियों में भारतीय अप्रवासी मॉरिशस आये, सम्भवत: वे शारीरिक और मानसिक गुलामी के शिकार थे । वे अपने साथ गीता, पुराण, पंचतंत्र, आल्हा आदि धर्मग्रन्थ व लोक ग्रन्थ लाये थे और वे थके-माँदे बैठकर अपने दु:ख भु्लाने के लिए वाचन या गायन करते थे । उन कथाओं और घटनाओं की अभिव्यक्ति नि:सन्देह शब्दों के साथ शारीरिक हाव-भाव के साथ होता था । और वही हाव-भाव नाटक का रूप ले लेता था । अवकाश प्राप्त होने पर कथा-कहानी भी कहने का प्रचलन था । शादी-ब्याह के अवसरों पर अब भी गाँवों में स्त्री-मण्डली जुटती है । नाट्य-संध्या में भाग लेने के लिए पास-पड़ोस की महिलाओं को आमन्त्रित किया जाता है । एकत्रित होकर स्त्रियों प्रार्थना, कीर्तन और गीतों के साथ ढोलक-मँजीरा और लोटा बजाकर लोक नृत्य और रूपक करती हैं । जाने-माने लोगों की नकल और प्रगलित घटनाओं का साभिनय वर्णन होता है । बीच-बीच में चाय-पान, इलायची, अदरक और चने से सत्कार किया जाता है । स्त्रियाँ पुरुष के वस्त्र पहन कर मसखरी करती हैं । पुराने समय में पुरुषों द्वारा स्त्रियों की वेशभूषा में नृत्य और नाटक करने का प्रचलन था पहले यह लोक नाट्य सप्ताह तक पूरी रात तक चलता था । यह नाट्य-परम्परा सम्भवत: आज भी गाँवों में जीवित है जिस पर खोज कार्य और संरक्षण के काम शेष हैं ।

युवा लोगों के बीच गुल्ली-डंडा, लामारेल, कासकोत, खलीफ़ा और नाटक प्रचलित थे जब देश में सिनेमा और टेलीविज़न का आगमन न हुआ था। इटली, ग्रीस, भारत आदि देशों की नाट्य-परम्पराएँ धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हुई पाई जाती हैं । धार्मिक लीज-त्योहारों के अवसरों पर रामलीला, इन्डरलीला, आदि नाटक मन्दिरों के प्रांगण में या खुली हवा में प्रदर्शित करने की प्रथा थी और कहीं-कहीं अब भी जीवित है ।

सत्य-हरिश्चन्द नाटक १९२२ में त्रियोले में प्रस्तुत किया गया था । यह प्रथम प्रमाणिक नाटक महेश्वरनाथ मन्दिर में प्रस्तुत किया गया था जिसमें श्री ल. दसोई, म. खेदू , इ. जिऊत आदि कलाकारों ने भाग लिया था ।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में देश भर में लगभग अस्सी छोटी-बड़ी नाट्क मण्डलियाँ थीं जो पौराणिक या धार्मिक कथाओं पर आधारित नाटक प्रस्तुत करती थीं । इस समय के नाटक काफी लंबे, संगीत और संवाद प्रधान होते थे । सम्भवतः स्त्री-पाठ भी पुरुष ही निभाया करते थे ।

चलचित्र के आगमन से पूर्व भारत में पारसी रंगमंच की अपनी विशेष पहचान थी । भारतीय फिल्मों में नाच-गाने पारसी रंगमंच का ही प्रभाव है जिसके कारण विश्व-सिनेमा जगत् में उनकी अपनी विशेषता और पहचान है । पारसी रंगमंच के प्रभाव ने मॉरीशस में रंग प्रेमियों को भी अछूता नहीं छोड़ा । कुछ व्यावसायिक नाटक कंपनियाँ भारत से भी आईं । कई देशी कंपनियाँ देश के कोने-कोने में लैला-मजनू , सत्य हरिश्चन्द्र, अलि बाबा चालीस चोर, पाक जाद परी, असिरे हिरस, चन्द्रावली, यहुदी की लड़की, सीत स्वयंवर, सावित्री-सत्यवान आदि नाटक पारसी रंग-शैली में प्रस्तुत करती थी । इन सभी नाट्कों में स्त्री-पात्र की भूमिका पुरुष लोग इतनी सफलतापूर्वक निभाते थे कि दर्शकों को पता तक नहीं चलता था । सूत्रधार नटखट और मसखरा होता था जो नाटक के बीच-बीच में आकर दर्शकों को हँसाता रहता था । चाहे उनमें नाटकिय तत्त्वों का अभाव था फिर भी दर्शक बड़े चाव से पैसे देकर नाटक देखने के लिए हिचकिचाते नहीं थे ।

१९४८ में सिनेमा का आगमन हुआ । देश भर में कई सिनेमा- भवनों के निर्माण हुए । मूक-चित्र के बाद वाक् चित्रों का प्रचलन हुआ । विदेशी और भारतीय हिन्दी फिल्मों के प्रदर्शनों से रंगमंच को भारी धक्का लगा जिससे नाटक-कंपनियाँ एक-एक करके लुप्त हो गईं ।

१९५० में यूथ हाउस की स्थापना हुई । १९५१ में प्रथम अंग्रेजी नाटक प्रतियोगिताएँ और १९५३ में फ्रेंच में आयोजन हुई । हिन्दी एकांकियों का प्रस्तुतिकरण बैठकों के वार्षिकोत्सव के अवसर पर होने लगे । स्थानीय रेडियो में भी हिन्दी रूपकों का प्रसारण होने लगा ।

१९५२ में त्रियोले अजन्ता आर्ट्स ने नये कलाकारों को सामने लाया और रंगमंच को नया मोड़ दिया । १९५४ में अपना प्रथम नाटक 'परिवर्तन' का मंचन किया था । १९६० तक जगह-जगह १२ एकांकियों के मंचन हुए । १९६४ में दूरदर्शन के आगमन से अजन्ता आर्ट्स ने 'वह कौन था' प्रथम हिन्दी का टी. वी. एकांकी का सीधा प्रस्तुतिकरण किया था । कई रेडियो नाटकों का भी प्रसारण किया । मॉरीशस की अन्य संस्थाओं द्वारा भी एकांकियों का सीधा प्रसारण होता रहा ।

१९६१ में रविन्द्रनाथ ठाकुर शताब्दी के अवसर पर विसर्जन, डाकघर, चित्रा, मालिनी आदि नाटक सफलतापूर्वक खेले गये । हिन्दी लेखक संघ, आर्य सभा, हिन्दी प्रचारिणी सभा, अध्यापक प्रशिक्षण महाविद्यालय और अजन्ता आर्ट्स ने हिन्दी एकांकी लेखन और मंचन को अपने-अपने ढंग से प्रभावित किया ।

१९६२ में हिन्दी सप्ताह और तुलसी-प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर सावान संगीत संघ द्वारा एल. पी. रामयाद का 'मन्त्र' नाटक प्रस्तुत किया गया था ।

१९६३ में हिन्दी लेखक संघ ने किंग्स सिनेमा भवन, गूडलेंस में प्रथम हिन्दी एकांकी प्रतियोगिता का आयोजन किया था जिसमें चार एकांकी प्रस्तुत किये गये थे :

१. गूडलेंस कला निकेतन द्वार शरारती बहन

२. बोनाकेय रामकृष्ण संघ द्वारा परिणाम

३. त्रियोले प्रभात संघ द्वारा राधा

४. बांबू युवक संघ द्वारा शिकारी

इस प्रतियोगिता में छत्रदत्त हीरामन को 'राधा' नाटक में श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार प्राप्त हुआ था ।

१९६४ में प्रशिक्षण महाविद्यालय के छात्रों द्वारा 'गधे' नाटक का मंचन हुआ था ।

१९६९ में हिन्दी का पूरा नाटक (Full Length Play) आरनोवा सर्कल ने जयशंकर प्रसाद कृत 'ध्रुवस्वामिनी' नाटक का निर्देशन राजकरण बम्मा ने किया था । इसकी सफलता को देखते हुए दूसरी प्रस्तुति पोर्ट लुई थियेटर में ही १९७१ में की गई । इसमें मुख्य भूमिका में शोभना दशरथ, राजकरण बम्मा, घ० जतुआ, राज जीऊत और राजेन बुद्धू थे ।

मई १९७१ में पोर्ट लुई रंग भवन में डी. के. जानकी के निर्देशन में उपेन्द्रनाथ अश्क का एकांकी 'बात की बात' तथा दो छोटे एकांकी प्रस्तुत किये गये थे । अपने साहित्यिक आन्दोलन के अन्तर्गत हिन्दी परिषद् ने ३ अक्टूबर को अपने आठवें वार्षिकोत्सव के अवसर पर एक नाटक समारोह का आयोजन किया जिसमें पोर्ट लुई, रिव्येर जी रांपार और सेंप्येर हिन्दी परिषदों ने एकांकी प्रस्तुत किये थे ।

१९७२ में मॉरीशस कला-केन्द्र की स्थापना श्री प्रियदत्त मेवासिंह की अध्यक्षता में हुई । प्वेंत ओ साब में श्री मेवासिंह जी के प्रांगण में हिन्दी एकांकी प्रतियोगिता के प्रथम चरण आयोजित किये गये थे । १८ मई को १९७३ को प्लाज़ा थियेटर में इसका फाइनल सफलतापूर्वक आयोजित किया गया था जिसमें अभिमन्यु अनत का कवि टिंगू, डी.के. जानकी का 'जय राम जी की' , राजेन्द्र कुमार वर्मा के 'पर्दा उठने से पहले' और 'अफसर' एकांकी प्रस्तुत किये गये थे ।

युवा तथा क्रीड़ा मंत्रालय के तत्त्वावधान में यूथ हाउस द्वारा प्रथम युवा नाटक प्रतियोगिता १९५१ में अंग्रेज़ी और फ्रेंच में १९५३ में आयोजित हुए थे । १९६८ में मॉरीशस को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय भाषाओं के विकास और समानाधिकार के प्रश्न पैदा हुए । आज़ादी के पाँच वर्ष बाद १९७३ में माननीय दयानन्दलाल बसंत राय ने जो उस समय युवा तथा क्रीड़ा मन्त्री थे ने निर्णय लिया कि अंग्रेज़ी और फ्रेंच की तरह भारतीय भाषाओं में भी नाटकोत्सव होना आवश्यक है । १९७३ में प्रथम बार राष्ट्रीय तौर पर हिन्दी में नाटक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । इस के आयोजन के लिए हिन्दी ड्रामा समिति का गठन प्रोफेसर रामप्रकाश की अध्यक्षता में हुई । नाटक -समिति ने दिसम्बर १९७२ में प्रथम नाटक-कार्यशाला आंस-लारे प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित किया जिसका कार्यभार सर्वश्री अभिमन्यु अनत, मुनिश्वरलाल चिंतामणि, पं. रविशंकर कौलेसर और डी.के. जानकी ने संभाला था । देश के कोने-कोने से १०० युवा रंग-प्रेमियों ने इसमें भाग लिया । कार्यशाला के अन्तर्गत तीन एकांकी तैयार किये गये थे जिसकी प्रस्तुति शिविर की अन्तिम रात को की गई थी । अभिमन्यु अनत का 'सुलह' और हार कहाँ ? ठाकुरदत्त पाण्डे का 'बुझ गया दीपक ' । इस नाटक शिविर से नये कलाकारों में नई रंगचेतना उभर कर आई ।

नाटक आन्दोलन को नया जीवन और मोड़ देने के लिए मॉरीशस सरकार ने भारत से मोहन महर्षि को नाटक-सलाहकार के रूप में आमन्त्रित किया । उनके यहाँ आने से नाट्यान्दोलन को पूरा बल प्राप्त हुआ । महर्षि दम्पत्ती ने आँस-लारे युवक-केन्द्र में दो सप्ताहों के नाटक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया । नाटक के विभिन्न पहलुओं पर युवकों को नई रंगदृष्टि प्राप्त हुई । उस अवसर पर मोहन राकेश कृत 'आषाढ़ का एक दिन ' नाटक का प्रथम अंग तैयार और प्रदर्शित भी किया गया था ।

सितम्बर १९७३ को युवा तथा क्रीड़ा मंत्रालय ने हिन्दी में युवा नाटक प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें देश के कोने-कोने से २२ नाटकों के प्रदर्शन हुए । फाइनल के लिए चार नाटक प्लाज़ा थियेटर, रोज़ हिल में प्रस्तुत हुए थे । वी.पी. का 'तीन अपाहिज ' , अभिमन्यु का 'मीठे बेर ' , मोहन राकेश का 'आधे-अधूरे ' और चैखव का 'क्लर्क की मौत' । शोभना दशरथ को आधे-अधूरे में श्रेष्ठ अभिनेत्री, क्लर्क की मौत में स्वबीर गुद्दर को श्रेष्ठ अभिनेता और श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार राजेन्द्र प्रसाद रघु को तीन अपाहिज के लिए प्राप्त हुआ था ।

प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए नियमों में परिवर्तन लाये गये । उम्र सीमा १८ से २५ वर्ष कर दी गई । खर्च की राशि १२५ रुपये से अब एक हजार रुपये कर दी गई है । १९८२ से युवा नाटक समारोह ने राष्ट्रीय नाटक समारोह का रूप ले लिया जिसमें भाग लेने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं । मॉरीशस में प्रचलित १० भाषाओं में आज हर वर्ष नाटक प्रतियोगिताएँ हो रही हैं । स्तर और संख्या की दृष्टि से हिन्दी नाटक अन्य भाषाओं की अपेक्षा श्रेष्ठ होते हैं । फाइनल तक तीन नाटकों के चयन के लिए की बार सेमी-फाइनल के आयोजन भी होते हैं ।

१९७८ में भारत से रणवीर सिंह नाटक सलाहकार के रूप में आये । पहले वे महात्मा गांधी संस्थान से और बाद में युवा तथा क्रीड़ा मंत्रालय के साथ जुड़े रहे । उन्होंने महात्मा गांधी संस्थान और बेल रोज़ और यूथ हाउस में नाटक कार्यशालाएँ आयोजित कीं और नाटक आन्दोलन को अग्रसर होने में अपना योगदान दिया ।

समय-समय पर विदेश से कई रंगकर्मियों का आगमन होता रहा । नाटक के विकास की कई कार्यशालाएँ आयोजित की गईं ।

१९७३ में Mr.Anthony Cornish ने ब्रिटिश काउंसिल के सौजन्य से त्रफालगर वाक्वा में युवकों के साथ नाटक पर कार्यशालाएँ कीं ।

१९८० में प्रख्यात अमरीकी अभिनेता, नाटककार और अध्यापक Charles Pace ने तीन दिनों की एक कार्यशाला का संचालन किया । उसी वर्ष फ्रांस से नाटक-सलाहकार Mr. Jacques Boulbet ने कई दिनों का ड्रामा कोर्स वाक्वा में किया ।

उसी साल युनेस्को के नाट्य-सलाहकार तथा प्रशिक्षक, जर्मनी के Mr. Fabio Pacchioni ने कई दिनों का प्रशिक्षण दिया । १९९० में वे पुनः आये और चीनी सांस्कृति केंद्र में एक सप्ताह का कोर्स किया ।

१९८२ में London Shakespeare Group जब अपने नाटकों की प्रस्तुति के लिए मॉरीशस आये थे तो मन्त्रालय ने उनके साथ एक कार्यशाला का आयोजन किया था ।

रंगमंच की विविध विद्याओं में एक महीने की एक कार्यशाला भारत के रंगकर्मी रोबिन दास ने अप्रैल १९८५ में त्रफालगर हॉल में संचालित की । उस अवसर पर कींग उबू नामक नाटक का मंचन प्रशिक्षार्थियों ने किया था जो अंग्रेज़ी और हिन्दी मिश्रित भाषा में प्रस्तुत की गई थी ।

शिक्षा मन्त्रालय, एम. एफ.डी.सी. के सहयोग से रंगमंच पर दो दिनों की कार्यशाला ३० और ३१ मई १९८९ को इन्दिरा गांधी सांस्कृतिक केन्द्र में आयोजित की जिसका संचालन भारतीय रंगमंच और फिल्मी अभिनेता और निर्देशक एम.के. रैना ने किया । उस समय वे रमेश रामदयाल की कहानी-अंकूर, तोता मैना में काम करने के लिए यहाँ आये थे ।

कला तथा संस्कृति मंत्रालय भारत से १० अफसर रंगमंच में निष्णात होकर आये हैं । समय-समय पर कई नाटक कार्यशालाएँ आयोजित होती रहती हैं । प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में नाटक के प्रचार और विकास के लिए प्राथमिक और माध्यमिक पाठशाला के अध्यापकों को रंग दृष्टि प्रदान करने के लिए तीन दिनों की अलग-अलग नाटक कार्यशालाएँ त्रफालगर हॉल में हुई ।

गूडलेंस के ही स्वस्तिका ग्रुप की ओर से लगातार दस वर्षों से हर साल दीवाली के अवसर पर एकांकी प्रतियोगिताएँ सुचारु रूप से चल रही है जिसमें आकर्षक पुरस्कार भी दिये जाते हैं ।

माध्यमिक स्कूलों में ड्रामा सोसाइटी के गठन भी हो रहे हैं । कई बार नाटक प्रतियोगिता को त्रफालगर वाक्वा से निकाल कर विकेन्द्रीकरण के असफल प्रयास हुए हैं । स्टेट सेकेन्डरी स्कूलों के रंग भवन नाटक प्रस्तुति के लिए अनुपयुक्त तो है ही गाँवों में सिनेमा भवन और उचित हॉल न होने से विकेन्द्रीकरण को आघात पहुँच रहा है फिर भी Citizen's Advice Bureau की ओर से श्री राजनारायण गति की देखरेख में दो वर्षों से फ्लाक जीले में सराहनीय प्रयास हुए है । प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी पाठशालाओं में हिन्दी एकांकी प्रतियोगिता के आयोजन विकेन्द्रीकरण के स्वस्थ अनुकरणीय उदाहरण हैं ।

इसी दिशा में गूडलेंस त्रिशूल ग्रुप की ओर से गूडलेंस के प्राथमिक पाठशालाओं के लिए हिन्दी नाटकों की प्रतियोगिताएँ विद्यार्थियों में नाट्य संस्कार पैदा करके रंगमंच आन्दोलन को निःसंदेह नई दिशा प्रदान करने का काम करेंगे ।

रंगमंच की पिछले दो दशकों की उपलब्धियां

२० दिसम्बर, १९७३ को प्लाज़ा थियेटर, रोज़ हिल में डॉ. धर्मवीर भारतीय का नाटक ' अंधा युग ' मोहन महर्षि के निर्देशन में हुआ । रंगमंच के क्षेत्र में निःसंदेह यह एक महान उपलब्धि और नई दिशा का श्रीगणेश और मॉरीशस के नाट्य इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । महाभारत की कथा पर आधारित यह नाटक २ मई १९७४ को डॉ. धर्मवीर भारती की उपस्थिति में पुनः मंचित हुआ था । त्रिवेणी संस्था की ओर से प्रस्तुत इस नाटक की तैयारी उस समय के योजना मंत्री खेर जगतसिंह के नेतृत्व में हुआ था । 'अंधा युग ' का मंचन नागपुर में हुए प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर त्रिवेणी और युवा तथा क्रीड़ा मन्त्रालय के तत्वावधान में हुआ । ११ जनवरी १९७५ को घनवटे रंग मंदिर, नागपुर में और १७ जनवरी को गांधी मेमोरियल हॉल नई दिल्ली में इसके सफल मंचन हुए थे ।

१९७५ में मॉरीशस में जेरवेज़ तूफान के आने से देश भर में क्षति पहुँची थी । तूफान से पीड़ित प्रधानमंत्री सहायता कोष के अन्तर्गत ' अन्धा युग ' के कई प्रदर्शन लोटस, शेमें ग्रेन्ये, नाज़-सेंप्येर, एरोस-प्लेन दे पापाय, कापीटोल-रोज़बेल आदि जगहों में हुए और जो राशि प्राप्त हुई सहायता कोष को अर्पित किया गया ।

त्रिवेणी संस्था की ओर से १४ मार्च १९७६ को रोज़हील नगर पालिका के सिविक वीक के अन्तर्गत मोहन राकेश का नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' प्लाज़ा में प्रस्तुत किया गया ।

२८ से ३० अगस्त १९७६ तक महात्मा गांधी संस्थान में द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हुआ था । उस अवसर पर त्रिवेणी द्वारा मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन नाटक की प्रस्तुति मोहन महर्षि के निर्देशन में महात्मा गांधी संस्थान के सभागृह में हुई । उसी अवसर पर मोहन महर्षि के निर्देशन में युवा तथा क्रीड़ा मन्त्रालय के नाटक विभाग द्वारा बादल सरकार कृत प्रयोगात्मक नाटक एवं इन्द्रजीत का मंचन प्लाज़ा रंगमंच में हुआ ।

शरद जोशी का हास्य व्यंग्य नाटक 'एक था गधा' मॉरीशस रंग चेतना द्वारा महेश राम्जियावन के निर्देशन में तैयार किया गया था । त्रफालगर हॉल, वाक्वा में इस का प्रथम प्रदर्शन शनिवार १३ जुलाई, १९८० को हुआ था । इसके दर्जनों प्रदर्शन देश के कोने-कोने में हुए । आनन्द सिनेमा में २ प्रदर्शन हुए । एरोस, सूरज, ग्लोब, पोर्ट लुई थियेटर, बी.डी. सी. आदि भवनों में इसके मंचन हुए । इस नाटक में ३० कलाकारों ने भाग लिया था जिसमें प्रेम सिबालक, धननारायाण जीऊत, बसन्त रामजियावन, शान्ताराम चूलन आदि रंगमंच के नामी हस्ताक्षरों ने काम किया था ।

जून १९८१ में डॉक्टर लक्ष्मीनारायण लाल का नाटक सब रंग मोहभंग राजेन्द्र प्रसाद सादासिंह के निर्देशन में हुआ । मॉरीशस हिन्दी नाटक सभा की ओर से इसकी प्रस्तुतियाँ आनन्द, त्रियोले और ग्लोब-लालमाटी में हुई ।

अभिमन्यु अनत द्वारा लिखा नाटक कोप भवन महात्मा गांधी संस्थान में प्रस्तुत किया गया था । रामायण की एक घटना पर आधारित इस नाटक का निर्देशन महेश रामजियावन और राजकरण बम्मा ने किया था । इसकी प्रस्तुति महात्मा गांधी संस्थान के प्रेक्षा गृह में और प्लेंत ज़ेरोम यूथ सेंटर में की गई थी । इस नाटक में शोभना निऊर (कैकेयी) छत्रदत्त हीरामन (दशरथ) हरिनारायण महावीर (राम) धननारायण जीऊत (लक्ष्मण) सुन्दरलाल मीतू (वशिष्ठ) और इन्दिरा सिनिधन ने (सीता) का पाठ अदा किया था ।

१९८२ में राजकरण बम्मा ने The Ensemble नातक संस्था की स्थापना करके क्रियोली, हिन्दी , अंग्रेज़ी और मिश्रित भाषाओं में नाटक तैयार किये । उसका मृच्छकटिक का हिन्दी-क्रियोली रुपान्तर, Paul et Virginie का हिन्दी मंचन और 4 Lor Baze संगीत नाटक की प्रस्तुतियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं । हिन्दी मिश्रित भाषाओं ने नशीली दवा के विरुद्ध ज्ञान सिबालक का 4 Lor Baze, Kan La Flam Lévé और पुरुषोत्तम सिंह बोला के Zaza नाटक चर्चित हुए थे ।

मॉरीशस की १७वीं स्वतन्त्रता वर्षगाँठ ५ से ११ मार्च १९८४ को मनाया गया था उस अवसर पर एक नाटक समारोह सप्ताह भर के लिए त्रफालगर हॉल वाक्वा में मनाया गया था । उस अवसर पर अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी में नाटक प्रस्तुत किये गये । ७ मार्च को जीवन हरनामसिंह का दो ठग, ९ मार्च को दयाप्रकाश सिन्हा का ओ अमेरिका कृष्णदत्त बूतना के निर्देशन में और राजकरण बम्मा का निर्देशित सपनवा १० मार्च को प्रस्तुत किया गया था जो शेक्सपियर के Midsummer Nights Dream का हिन्दी रूपान्तर था ।

१९८४ में राष्ट्रीय नाटक समारोह के अन्तर्गत अप्रवासियों के आगमन और गुलामी प्रथा का अन्त विषय पर एकांकी और नाटक प्रतियोगिताएँ आयोजित हुईं । उस अवसर पर १० भाषाओं में इसी विषय पर १२० नाटकों का मंचीकरण हुआ था जिसमें हिन्दी एकांकियों की संख्या ३१ थी और ८ बड़े नाटक प्रस्तुत किये गये थे ।

मॉरीशस में भारतीय अप्रवासियों के आगमन के १५० वर्ष (१९३४-१९८४) भारतीय मज़दूरों ने अपनी मेहनत, पसीने, आँसू और रक्त से इस भूमि को ऊर्वर बनाकर इसे सुख और शान्ति का स्वर्ग बनाया हमारे पूर्वजों के धरोहर, मूल्यों और भाषा-संस्कृति के संरक्षण, विकास और रक्षा हेतु इसमें कई आयोजन हुए । इस अवसर को मनाने के लिए स्थानीय और विदेशी कलाकारों द्वारा कई सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए । हिन्दी में अभिमन्यु अनत द्वारा लिखित और राजेन्द्र प्रसाद सदासिंह के निर्देशन में प्रस्तुत गूँगा इतिहास उल्लेखनीय है ।

'गूँगा इतिहास ' भारतीय गिरमिटियों के दारुण दण्ड और यंत्रणा के बिसरे-भुलाये क्षणों की दास्तान है जिसे समय ने दफना दिया था ।

इस नाटक का प्रथम प्रदर्शन महात्मा गांधी संस्थान द्वारा ११ फरवरी १९८४ को प्लाज़ा थियेटर में हुआ । सितम्बर, १९८४ को ही फूलियार, रिव्येर जी रांपार में जहाँ प्रथम मज़दूर कोठी में काम करने गये थे, खुले मंच पर एक वृहद प्रस्तुति हुई जिसे १४,००० दर्शकों ने देखा था । इस नाटक के १७ प्रदर्शन देश के कोने-कोने में हुए ।

अक्टूबर १९८४ में 'गूँगा इतिहास ' की प्रस्तुति भारत के मुख्य शहरों में हुई । भारतीय विद्याभवन, बम्बई, आज़ाद भवन,नई दिल्ली, रविन्द्रालय लखनऊ, भोपाल, पटना और पराडकर संस्कृति भवन, बनारस में इसके सफल प्रदर्शन हुए ।

भारतीय अप्रवासियों के आगमन के १५० वर्ष के उपलक्ष में ही त्रियोले के भारती रंग मन्दिर ने चन्द्रप्रकाश दसोई द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक 'इतिहास साक्षी है' के की प्रदर्शन किये । महात्मा गांधी संस्थान में इसका प्रथम प्रदर्शन और प्लाज़ा में १९ सितम्बर को हुआ ।

इतिहास साक्षी है मॉरीशस के इतिहास में गुजरे कुछ काले और क्रूर पृष्ठों के संघर्ष भरी कहानी है । जब हमारे पूर्वज दासता की बेड़ियों में जकड़े दुःख और यंत्रणाओं की जिन्दगी से मुक्ति पाने के लिए तड़प रहे थे ।

इस नाटक की प्रस्तुति प्लाज़ा थियेटर, तदबीर सिनेमा, त्रियोले, त्रफालगर हॉल वाक्वा, रेनेसाँस कॉलेज , क्यूर्पीप और लालमाटी सरकारी पाठशाला के प्रांगण में हुई ।

शिक्षा, कला तथा संस्कृति मंत्रालय की ओर से गिरीश कर्नाड कृत हयवदन महेश रामजियावन के निर्देशन में २६ अक्टूबर १९८६ को महात्मा गांधी संस्थान के रंगभवन में प्रस्तुत किया गया । यह अनन्य प्रयोगत्मक नाटक-देवदत्त, पद्मनी और कपिल का है जिसमें अपूर्ण मनुष्य को सम्पूर्णता की तलाश करते दिखाया गया है । विष्णु हरि ने कपिल, धीरज महादेव ने देवदत्त और इण्डियाना गोबीन ने पद्मनी की भूमिका निभाई थी । इसकी प्रस्तुतियाँ रिव्येर जी रांपार, पेची राफ्रे, गुदलेंस, त्रियोले, नुवेल फ्रांस, माहेबर्ग आदि स्थानों में हुई थी ।

अक्टूबर १९८६ में राजेन्द्र सादासिंह और प्रेम सिबालक के निर्देशन में अभिमन्यु अनत का 'रोक लो कान्हा' नाटक महात्मा गांधी संस्थान , तदबीर और रिव्येर जी रांपार स्टेट सेकेण्डरी स्कूल के प्रेक्षागृह में प्रस्तुत किये गये ।

मॉरीशस में अन्तर्राष्ट्रीय सागर महोत्सव ६ से १६ सितम्बर, १९८७ तक बड़ी धूमधाम से मनाया गया । विश्व के कई देशों से सांस्कृतिक ग्रुप भाग लेने के लिए आये थे जिसमें भारत से बहुसंख्या में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये थे ।