INDIAN LANGUAGE IN MAURITIUS(मॉरिशस में भारतीय भाषा)


The use of Indian languages on the island is associated by most of us with the huge immigrations of the 19th century. In fact, the Indian presence dates from the earliest days of human settlement of Mauritius. There were slaves and convicts from Bengal and South India on the island during the years of Dutch occupation, who no doubt conversed in their own languages with other immigrants from their regions of origin. No details of their linguistic skills from this period, survive, however. Their numbers were very small, and we can at present only guess at their means of communication with fellow-Indians and with the heterogeneous slave population of Dutch Mauritius.

The free South Indian community of the Isle of France, known as the Malabars, are the best known of these groups of early Indian arrivals. They lent their name to an entire section of the capital, which became known as the Camp de Malabars (present day Plaine Verte and its environs), occupied important posts in the government of the day, and were a significant element of the local socio-political scene. The Isle of France was not a secular state – Christianity was the religion of the rulers, and Christian names were imposed for the purposes of civil status records.  An important group within  the Malabar community was already Catholic, many having been influenced by the strong Jesuit presence in South India, but another faction remained staunchly Hindu.  Like a third community of Indian origin in the Isle of France, the free Lascar or Muslim population, they paid only lip-service to the state religion, adopting Christian first names and accepting baptism where necessary, but adhering to their own faith. The Muslim community was more heterogeneous in composition, comprising members from as far afield as Bengal and Bombay, as well as some South Indians. Many of their number had originally been seafarers, but by the late 18th century, many Muslims had settled permanently on the Isle of France, as cultivators of land, market traders and the like. Finally, the slaves brought from India and sold to Isle of France inhabitants were also from various regions of the country, and hence spoke different languages.  Records clearly indicate that amongst the servile population of the island were Bengalis, Telegus, Tamils and even some Marathis, so that all of these languages must have been spoken on the island at this time. Again, however, few records survive, and the impulse towards creolisation was strong.


Even before the streams of indentured labour which began in 1834 and were to revolutionise the demographic make-up of Mauritius, new Indian immigrants made an impact on the new British colony. Indeed, Indian troops participated in the capture of the island itself, and whilst most were shipped back to fight other wars for the British within a few months of the conquest, it is possible that some stayed on. The new British administrators brought civil servants from India who were competent in English and who occupied clerical positions in the new colony. Annasamy, a Tamil who went on to be an important planter, owning Bon Espoir, was one of several Indians who arrived in the first few years of British rule, to take up employment in a government department.

Indeed it was the Tamil language which was the most influential of the Indian vernaculars in Mauritius prior to the mass arrival of Bhojpuri speaking North Indians. Trading communities of South Indian Tamils and Western Indian Gujarati speakers were the first to establish printed material in their languages on the island, and it is no coincidence that on Mauritian banknotes the Tamil language takes pride of place, and that Gujarati also figures. This is a throwback to the relative importance of these languages in the past – an issue which has recently caused controversy in a modern Mauritius where Hindi is now the dominant Indian vernacular. An attempt to give Hindi a more prominent place on the banknotes resulted in a climbdown after Tamils – and others with a sense of history! – protested.  It was a strong indication that language remains, and has always been, a political question on the island.

हिंदी काल विभाजन

आधुनिक काल / गद्य काल (1900 - आज तक)

हिन्दी भाषा का प्राचीन साहित्य विश्व की समस्त भाषाओं की तरह पद्य रचना से ही आरम्भ होता है । हिन्दी साहित्य में पद्य का ही प्राधान्य रहा है । पद्य रचना पर ब्रजभाषा का एकछत्र राज्य था । ब्रजभाषा गद्य का प्रचलन तो हुआ लेकिन उचित रूप से प्रचार तथा प्रसार नहीं हो पाया ।

खड़ीबोली गद्य का श्रीगणेश गंग कवि की " चन्द-छन्द बरनन की महिमा " नामक गद्य पुस्तक से होता है । इस का रचना काल सन् 1570 ई० है । यह गद्य-पुस्तक ब्रज-मिश्रित खड़ी बोली में लिखी गई है । श्रृंखलाबद्ध, साधु और व्यवस्थित भाषा के दर्शन सर्वप्रथम 1731 में हुआ था ।

खड़ीबोली में व्यवस्थित गद्य लिखने का सूत्रपात करने का श्रेय चार महानुभावों को है - मुन्शी सदासुखलाल, इंशाअल्ला खाँ, सदल मिश्र और लतलूलाल । इनमें मुन्शी सदासुखलाल और इंशाअल्ला खाँ ने स्वान्त-सुखाय ( अपने सुख के लिए ) तथा सदल मिश्र और लतलूलाल ने फोर्ट विलियम कालेज छत्रछाया में अंग्रेज़ अफसरों की प्रेरणा से लिखा । चारों की भाषा में अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं । सदा सुखलाल की भाषा कुछ पण्डिताऊपन लिए हुए हैं, लतलूलाल जी की भाषा में ब्रजभाषा का पुट अधिक है । वह प्रमुख रूप से पद्य का गद्यानुवाद है । इंशाअल्ला की भाषा शुद्ध हिन्दी होते हुए भी उस पर फारसी का प्रभाव है । इनकी भाषा कुदकती-फुदकती हुई है । सदल मिश्र की भाषा पर बिहारी का प्रभाव है । सदल मिश्र की भाषा का रूप सर्वत्र एक-सा नहीं दिखाई देता है ।

इन चारों महानुभावों में मुन्शी सदासुखलाल ही ऐसे गद्य- लेखक हैं, जिनमें आधुनिक खड़ीबोली के दर्शन होते हैं । अत: मुन्शी जी को खड़ी-बोली-गद्य का प्रवर्तक समझना चाहिए ।

ईसाइयों का योगदान :- हिन्दी गद्य के निर्माण में ईसाई- प्रचारकों का काफी हाथ है । उन्होंने अपने धर्म का प्रचार करने के लिए हिन्दी को अपनाया । 'बाइबल' तथा अन्य धार्मिक पुस्तकों के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किए । आगरा में इन्होंने एक 'स्कूल बुक्स सोसाइटी' की स्थापना की, जहाँ से बहुत- सी शिक्षोपयोगी पुस्तकें प्रकाशित हुईं । यद्यपि इन प्रचारकों का ध्येय हिन्दी गद्य का विकास करना न था, पर वह इनके द्वारा अनायास ही हो गया । लार्ड मैकाले और चार्ल्स वुद की शिक्षा-योजनाओं ने भी हिन्दी-गद्य के विकास को अनजाने में सहयोग दिया ।

ईसाइयों की भाँति महर्षि दयानन्द ने भी धर्म - प्रचार हिन्दी में ही किया । गुजराती होते हुए भी उन्होंने अपने ग्रन्थ हिन्दी में लिखे, क्योंकि हिन्दी देशव्यापी भाषा थी । स्वामी जी के हिन्दी-प्रचार का प्रभाव पंजाब पर अच्छा पड़ा । आर्यसमाजी स्कूलों में हिन्दी को प्रधानता दी जाने लगी ।

आधुनिक काल

इसी समय सनातन धर्म के नेता पण्डित श्रद्धाराम ने भी धर्म -प्रचार के लिए कुछ गद्य रचनाएँ प्रस्तुत कीं । ब्रह्मसमाज के संस्थापक राजा राममोहन राय के प्रयत्न भी हिन्दी - गद्य के विकास में सहायक हुए । उर्दू ने कचहरियों तथा स्कूलों में अपना स्थान पा लिया था फिर भी सर्वसाधारण की भाषा होने के कारण धर्म-प्रचारकों ने हिन्दी को ही अपनाया ।

उर्दू और अंग्रेज़ी के बढ़ते हुए प्रचार के समय हिन्दी के सौभाग्य से राजा शिवप्रसाद को शिक्षा विभाग में स्थान मिला । उन के प्रयत्न से ही हिन्दी का स्कूलों में प्रवेश हुआ । उन दिनों हिन्दी का अभाव था । राजा साहब ने इस अभाव की पूर्ति करने का प्रयत्न स्वयं भी किया और दूसरों से भी करवाया । राजा साहब हिन्दी लिपि में उर्दू शब्दों के अत्यधिक प्रयोग के पक्षपाती थे । प्रान्तीय शिक्षा-विभाग के उच्च पदाधिकारी होने के कारण हिन्दी-उर्दू के समझौते का मार्ग स्वीकार करना पड़ा था । राजा

साहब का लक्ष्य था कि किसी प्रकार से भी, नागरी लिपि और हिन्दी भाषा, शिक्षा - विभाग के द्वारा सर्वसाधारण जनता में अपना घर कर ले ।

भारतेन्दु हरिश्चन्द ने हिन्दी की प्राण-प्रतिष्ठा की तथा हिन्दी गद्य का स्वरूप स्थिर किया, इसलिए आप हिन्दी - गद्य के प्रवर्तक माने जाते हैं । आपने स्वयं लिखा तथा साथियों को भी लिखने के लिए प्रोत्साहित किया । अपने कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया । निबन्ध, जीवन-चरित, उपन्यास, नाटक, गद्यानुवाद, समालोचना आदि सभी विषयों पर उन्होंने लेखनी उठायी ।

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का वर्तमान हिन्दी-गद्य-निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है । भाषा की शुद्धता पर द्विवेदी जी ने बल दिया । भारतेन्दु युग में तो भाषा का केवल एक निश्चित स्वरूप स्थिर हुआ, किन्तु द्विवेदी - युग में उसका संस्कार किया गया । उन्होंने ' सरस्वती ' पत्रिका के सम्पादन के द्वारा नवीन औए प्राचीन गद्य लेखकों के लिए शुद्ध हिन्दी लिखने का मार्ग बताया । समालोचना के द्वारा हिन्दी संसार में व्याकरण-विशुद्ध भाषा लिखने के कई बड़े-बड़े आन्दोलन उठाए । इससे हिन्दी-गद्य शैली का परिभार्जित स्वरूप निखरा और विस्तृत हुआ । संस्कृत के तत्सम शब्दों की ओर लेखकों का अधिक झुकाव हो गया और भाषा भी अधिक संस्कृत- गर्भित हो गई । परिणामस्वरूप वर्तमान काल के अनेक लेखक निर्माण का कार्य करने लगे । पं० रामचन्द्र शुक्ल तथा बाबू श्याम सुन्दरदास आदि इस युग के गम्भीर और महान समालोचक हैं । प्रेमचन्द, वृन्दावनलाल वर्मा, इलाचन्द जोशी आदि प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार हैं । जयशंकर प्रसाद जैसे महान नाटककार भी इसी युग में हुए । इस युग में हिन्दी-गद्य में प्रौढ़ता आई । इस काल का गद्य हिन्दी-साहित्य में बेजोड़ है । आज हिन्दी-गद्य अपनी समस्त विधाओं के रूप में पुष्पित और पल्लवित हो रहा है ।

श्रृंगार / रीतिकाल - 1700 - 1900

रीतिकाल का युग हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल के पश्चात् आता है । इस युग में रीति परम्परा भी विकसित हुई है । इस काल में श्रृंगार की परम्परा अश्लीलतम रूप में समाज के सामने आयी है । यह युग कला प्रधान युग ठहरा और रीति का विश्लेषण हुआ । इसीलिए इस का नाम रीतिकाल पड़ा ।

राजनितिक परिस्थिति :

इस समय शाहजहाँ राज्य करता था तथा अन्त में अंग्रेज़ शासक आये । यह काल सुख तथा वैभव का काल रहा है । शाहजहाँ के समय में सारे समाज में पूर्ण शान्ति थी और सारा समाज पूर्ण-रूप से भोग-विलास में लिप्त था । बादशाह आनन्द की रंगरलियों में मस्त था । यही कारण मुगल-साम्राज्य का ह्रास का प्रारम्भ हो गया था । चारों तरफ से विद्रोह हो रहा था । मराठे, सिक्ख, राजपूत तथा जाट मुगल साम्राज्य को चुनौती दे चुके थे । फौज में सुरा और सुन्दरी का आधिपत्य था । मुगल-साम्रज्य पूर्ण रूप से भीरू हो गया था । नवाबों और अंग्रेज़ों ने इसका खूब लाभ उठाया ।

सामाजिक परिस्थिति :

इस समय सारा समाज ही विलासिता में डूबा हुआ था । समाज ३ वर्ग में बँटे थे - उत्पाद, भोक्ता और कविगण

(१) ऊत्पादक में किसान और मज़दूर थे जिनकी अवस्था खराब थी और जो आए दिन झगड़ों में मिट

रहे थे और दुखी थे

(२) दूसरे भोक्ता वर्ग जिस में राजा, नवाब तथा इनके नौकर-चाकर थे जो भोग- वृति में अपना

जीवन व्यतीत कर रहे थे

(३) तीसरे कविगण थे जो राजाओं तथा बादशाहों के आश्रय में रह कर अपना जीवन चलाते थे

और उनको प्रसन्न करने में ही अपने को धन्य समझते थे । भोक्ता वर्ग रत्नजटित वस्त्रों को पहन

कर रँग-रलियाँ मनाते तथा नृत्य का आनन्द लेकर मदिरा का पान करके अपने राज्य, व्यक्तियों

तथा अपने आप को खो रहे थे । यही कारण है कि श्रृंगारिक काव्य ज्यादा लिखे गये ।

धार्मिक परिस्थिति :

इस काल में संत थे पर इतने प्रभावी नहीं थे । धर्म का वास्तविक विकास रूक गया था । कृष्ण-भक्ति की परम्परा चल रही थी परन्तु यह भी विलासिता प्रधान थी । संत-महन्त भी राजसी ठाठ से रहते

थे ।

साहित्यिक परिस्थिति :

साहित्य का सुन्दर स्वरूप किसी को दिखाई नहीं देता था क्योंकि बुद्धि विलासिता में डूब गयी थी । विकास की भावना रूक गयी थी । शुद्ध श्रोत दिखाई नहीं पड़ता था । राम और कृष्ण का आदर्श भी नहीं था । कवि गुलाम हो गया था । कहा भी है - " जैसा खाये अन्न वैसा बने मन ।" कविता राज दरबारों की हो गई थी । कृष्ण और राधा का स्वरूप भी लोगों ने बिगाड दिया । रीतिकाल के प्रमुख कवि देव और बिहारी हैं । राधा-कृष्ण की आड़ में विलासी राजाओं की काम-चेष्टाओं को उद्वीप करने के लिए नग्न-वर्णन किये । सारे कवियों ने ब्रज भाषा में लिखा । इस प्रकार यह काल रीति था श्रृंगार में डूब कर अपने आप को अश्लीलता, विलासिता और आड्म्बर की ओर ले गया।

विशेषताएँ :

(१) रस, अलंकार और काव्यांगों का जितना सफल विवेचन इस काल में हुआ उतना पहले किसी काल में नहीं मिलता है ।

(२) इस काल की कविताओं में केवल भावों की अभिव्यंजना ही नहीं , अपितु कवि की पाण्डित्य - प्रवृति भी स्पष्ट झलकती है ।

(३) यद्यपि श्रॄंगार रस की रचनाओं की इस काल में प्रधानता रही, पर वीर रस की सुन्दर रचनाओं का भी अभाव नहीं रहा ।

(४) कवियों ने विशेषत: दोहा, सवैया और कवित्त, इन तीनों छन्दों में ही रचनाएँ की हैं।

(५) रचनाओं की भाषा प्राय: मिश्रित ही रही है । अवधि, और ब्रज के साथ-साथ फारसी के भी कुछ शब्दों का प्रयोग हुआ है ।

(६) भाषा में आकर्षण लाने के लिए उस को कलात्मक बनाने का प्रयत्न इन कवियों ने किया है ।

(७) श्रृंगार का विवेचन इस काल के प्राय: सभी कवियों ने किया ।

(८) रीतिकाल का सम्पूर्ण काव्य मुक्तक के रूप रचा गया है ।

चारण काल / वीरगाथा काल / आदिकाल - सन् 1050 - 1375

विशेषताएँ :

राजनीतिक दृष्टि से यह युग भारतीय इतिहास के पतन और विघटन का युग था । सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात देश में एकछत्र शासन का अभाव हो गया था । राष्ट्र छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था । लोगों की रूची युद्ध की ओर अधिक थी । राज्यों के शासक मिथ्या शान के चक्कर में फँस कर आपस में लड़ाई किया करते थे । छोटी-छोटी बातों को लेकर प्राय: युद्ध हो जाया करते थे । कभी-कभी वीरता प्रदर्शन अथवा विवाह-शादियों के अवसर पर अकारण मारकाट हो जाती थी ।

चारण और भाट अपने आश्रयदाता राजाओं का ओजस्विनी भाषा में बढ़ा-चढ़ाकर शौर्य-प्रदर्शन किया करते थे और युद्ध क लिए प्रोत्साहित भी करते थे । इसीलिए इसे चारणकाल भी कहा जाता है । राजा-महाराजा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे तथा उसकी शक्ति क्षीण हो गयी थी । भारत में गृहयुद्ध देख कर यवनों के भी आक्रमण होने लगे । पश्चिम की ओर से मुसलमानों ने भी आक्रमण शुरु कर दिया था । पराक्रम-हीन क्षत्रियों ने भारत की प्रभु-सत्ता को विदेशियों के हाथ सौंप दिया था । क्षत्रियों का बिल्कुल पतन हो चुका था । वे दूसरे को नष्ट करने के घाट में रह कर अपना भी सर्वनाश कर रहे थे ।

बौद्ध धर्म का ह्रास होने लगा था । ब्राह्मण धर्म फिर से पनपने लगा था । इस युग में राजा का महत्व सर्वोपरि था । उस की इच्छा पर सम्पूर्ण राज्य निर्भर था । साधारण जनता का कोई महत्व नहीं था । इस समय खुमान रासो, बिसलदेव रासो, परमाल रासो जैसे वीर रस-पूर्ण ग्रन्थों की रचना हुई । अत: इसका नाम वीरगाथा काल रख दिया गया । इस युग के प्रमुख कवियों में चन्दवरदाई नरपति नालह, जगनिक आदि विशेष उल्लेखनीय है ।

वीरगाथा काल की विशेषताएँ :

(१) कवि अपने आश्रयदाता राजा की प्रशंसा और उसकी वीरता का बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन करता था ।

(२) सभी साहित्य डिंगल और अपभ्रंश भाषा में लिखे गये थे, लेकिन अपभ्रंश में लिखित

रचनाएँ महत्वपूर्ण है । लोकप्रियता की दृष्टि से डिंगल रचनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है ।

(३) आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा तथा उनके युद्ध और विवाह आदि का विस्तृत वर्णन, किन्तु

राष्ट्रीय भावना का अभाव था ।

(४) युद्ध का सजीव वर्णन तथा हृदयग्राही चित्रण हुआ है । कर्कश और ओजपूर्ण पदावली शस्त्रों

की झंकार की याद दिलाती है ।

(५) पारस्परिक वैमनस्य का कारण स्त्रियाँ थीं । अत: उनके विवाह एवं रोमांस की कल्पना तथा विलास - प्रदर्शन में श्रृंगार का श्रेष्ठ वर्णन मिलता है । उन्हें वीर रस के आल्म्बन रूप में ग्रहण करना भी इस युग की मुख्य विशेषता थी ।

(६) चरित - नायकों की वीर-गाथाओं का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन करने में ऐतिहसिकता कम और कल्पना का आधिक्य है ।

(७) वस्तुओं की सूची और सेना आदि का आवश्यकता से अधिक वर्णन होने से कथा में वर्णात्मकता का आधिक्य है ।

(८) वीरगाथाएँ दो रूपों में प्राप्त हैं - (१) प्रबन्ध काव्य के साहित्यिक रूप में -जैसे खुमान रासो और पृथ्वीराज रासो तथा

(२) वीर गीतों के रूप में - जैसे बीसलदेव रासो।

(९) विषय के अनुकुल ओजमयी भाषा - विशेषकर डिंगल का प्रयोग ।

(१०) उपलब्ध प्राय: सभी वीर गाथाएँ संदिग्ध हैं ।

वीरगाथा काल की कविता की विशेषताएँ :

(१) आश्रयदाता की स्तुति

(२) सच्ची राष्ट्रीयता का अभाव

(३) वीर रस के साथ श्रॄंगार का वर्णन

(४) युद्धों के सजीव वर्णन

(५) ऐतिहासिकता का अभाव

(६) कल्पना का बहुलता

पूर्व मध्यकाल / भक्तिकाल - 1575 - 1700

भक्तिकाल के आरम्भ के समय भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी । देश में मुसलमानों का राज्य स्थापित हो चुका था । भारतीय राजाओं को कुचल डाला गया । हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह समाप्त कर दिया गया । राजाओं की वीरता की प्रशंसा करने वाली वाणी स्वत: ही मूक हो गई । उन्होंने भारतीयों की स्वतन्त्रता के साथ-साथ उनके धर्म को भ्रष्ट किया ।

अपने पौरुष से हताश जाति तथा निस्सहाय हिन्दू जनता 'निर्बल के बल राम' का सहारा ढूंढने लगी और फलस्वरूप भ्क्तिकाल का आविर्भाव हुआ । मुसलमानों के अत्याचारों के सामने सामान्य जनता की धर्म भावना काफी दब चुकी थी । उसका हृदय धर्म से काफी हट चुका था । मुसलमान मूर्ति तोड़ने तथा देव मन्दिर गिराने में संलग्न थे । जनता में धार्मिक विश्वास कम हो गया । उसे न कर्म की प्रति आस्था रह गई थी और न भगवान् की कृपा में विश्वास ही रह गया था । जनता में भगवान् के प्रति अविश्वास होने लगा । उसके सामने ही उनके देव-मन्दिर गिराए जाते थे और मुरारी उनकी रक्षा न करते थे । उनकी आँखों के सामने ही उन की माताओं और बहनों के सतीत्व का अपहरण होता था । किन्तु द्रोपदी की पुकार सुनकर आने वाले मुरारी कहीं दिखाई न देते थे । इससे पण्डित वर्ग चिन्तित

थे । वे लोग वेदान्त, ब्रह्मसूत्रों, उपनिषदों, गीता आदि पर शास्त्रार्थ भाष्य आदि करने में संलग्न थे । फलस्वरूप परम्परागत भक्तिमार्ग के सिद्धान्त पक्ष का कई रूपों में नूतन विकास हुआ ।

इस काल में दो धाराएँ प्रबल रूप से बहीं - निर्गुण धारा और सगुण धारा । निर्गुण धारा में ईश्वर को निराकार मानकर सन्त कवियों ने ज्ञान की चर्चा की । सगुण धारा में ईश्वर को साकार मानकर उपासना करने वाले भक्त कवि हुए । निर्गुण धारा के दो रूप हो गये । ज्ञानाश्रयी शाखा , जिसके प्रमुख प्रवर्त्तक कबीरदास थे और प्रेममार्गी शाखा, जिसके जायसी आदि सूफी कवि अनुयायी थे । सगुण धारा भी दो शाखाओं में प्रवाहित हुई । रामभक्ति शाखा, जिसके प्रमुख अनुयायी गोस्वामी तुलसीदास थे और कृष्ण-भक्ति शाखा, जिसके अनुयायी गायक महात्मा कबीर थे । इस प्रकार भक्ति-भाव की प्रधानता होने के कारण 'भक्ति काल' नाम दिया गया ।

भक्तिकाल की विशेषताएँ

(१) इस काल के प्राय: सभी कवि उच्च कवि के सन्त और महात्मा थे । वे किसी के आश्रय में न रह

कर स्वच्छन्द रूप से कविता किया करते थे । उनका लक्ष्य जनता में भगवान् की महत्ता का

प्रचार करना था ।

(२) इस काल के कवियों ने धार्मिक क्षेत्र में मुख्यत: सुधार किया । इस के अतिरिक्त

सामाजिक, पारिवारिक एवं राजनितिक क्षेत्र में भी इन सन्त कवियों ने बहुत सुधार किया ।

(३) इस काल में भगवान् के नाम, जप और कीर्तन को मुख्य स्थान दिया गया है ।

(४) सभी भक्त कवियों ने अहंकार एवं बाहरी आडम्बरों का विरोध कर ईश्वर से निश्छल भाव

से सम्बन्ध स्थापित करने पर ज़ोर दिया है ।

(५) इस काल में प्राय: सभी प्रकार के काव्य रचे गये - मुक्तक, खण्डकाव्य और महाकाव्य आदि ।

(६) भाषा की दृष्टि से इस युग में तीन भाषाओं की प्रधानता रही –

(i) कबीर आदि सन्त कवियों की पंचमेल सधुक्कड़ी भाषा

(ii) प्रेम मार्गी और राम मार्गी कवियों की अवधी भाषा

(iii) कृष्ण मार्गी कवियों की ब्रजभाषा ।

(७) इस काल में छन्दों की दृष्टि से कबीर ने दोहों का, सूर ने पदों का, जायसी और तुलसी ने

दोहों, चौपाई आदि छन्दों का प्रयोग किया है । तुलसी ने सभी छन्दों का प्रयोग किया है ।

(८) रस की दॄष्टि से शान्त रस की प्रधानता रही है शान्त के अतिरिक्त अन्य रसों का प्रयोग गौण रूप

में हुआ है ।

(९) इस काल में भगवद नाम का महत्त्व तथा गुरु की महिमा तथा प्रेम-भावना का वर्णन किया है ।

(१०) भक्त और भगवान का पारम्परिक सम्बन्ध; यथा पिता-पुत्र, स्वामी-सेवक, पति-पत्नी आदि

रूपों में ।

(११) प्राचीन रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों का खण्डन किया है ।

(१२) इस काल की रचनाओं में शील और सदाचार का बड़ा ध्यान रखा गया है ।

(१३) इस काल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि भक्ति की चारों धाराओं –

ज्ञानमार्गी, प्रेममार्गी, राममार्गी और कृष्णमार्गी में सूक्ष्म अन्तर होते हुए भी एक नाम

से सम्बोधित किया जा सकता है ।

हिन्दी साहित्य की एक झलकी

विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी तीसरा स्थान रखती है । अंग्रेज़ी और मान्दारीन के बाद इसका यह स्थान आता है । यह प्राकृत और अपभ्रंश के बाद संस्कृत से निकली हुई भाषा है । बाद मे इसपर फ़ार्सी, अर्बी, अंग्रेज़ी, तथा अन्य भाषाओं का प्रभाव पड़ा । हिन्दी खड़ीबोली के नाम से भी जानी जाती है । इसका व्याकरण पाणिनी मुनी द्वारा तैयार किये गए संस्कृत व्याकरण के आधार पर ही है । कालोपरान्त कामताप्रसाद गुरु ने उसे सरल और व्यावहारिक बनाया । हिन्दी की लिपि आर्यों की भाषा संस्कृत के समान ही है और वह 'देवनागरी लिपि' से जानी जाती है । 'देवनागरी लिपि' शिरोरेखा --, मेरूदंड (।) और अनुपात (&) हो बनती है देवनागरी लिपि मुख्यत: तीन भागों में विभाजित होती है, और वे हैं - स्वर, व्यञ्जन और मात्राएँ । उच्चारण को सुगम करने के लिए व्यंजन के साथ हल ( \) लगाने से वह आधा हो जाता है जैसे -पत्ता , क्यारी ।

संसार के प्राय: हर देश में हिन्दी बोलने वाले पाए जाते हैं परन्तु इसका प्रयोग अधिकतर भारत में होता है । यह भारत की औपचारिक भाषा है । हिन्दी बोलने वालों की गिनती करोड़ों में होती है । यह विश्व की सब से वैज्ञानिक भाषा मानी जाती है । भारत के अतिरिक्त कई अन्य देशों में भी इस का पठन-पाठन व्यवस्थित रूप से होता है, जिनमें मॉरिशस, फ़ीजी, गयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और तोबागो तथा दक्षिण अफ्रिका प्रसिद्ध हैं ।

हिन्दी का अपना अत्यन्त ही धनी साहित्य है । दसवीं शताब्दी के आरम्भ में ही हिन्दी में रचनाएँ प्राप्त होने लगी थीं । उस ज़माने में लगभग सभी प्रणयन संस्कृत, मागधी, प्राकृत या अपभ्रंश में होते थे । जब से 'पृथ्वीराज रासो' नामक ग्रन्थ लिखा गया तब से अन्य कवियों तथा रचनाकारों ने भी हिन्दी का स्वागत किया और तभी से हिन्दी साहित्य का श्री गणेश माना जाता है । आरम्भ के कवियों में अमीर खुसरो का नाम आदर से लिया जाता है ।

हिन्दी साहित्य का विभाजन मुख्य चार कालों में किया गया है और वे क्रमश: इस प्रकार हैं - आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल ।

आदिकाल (१०५० - १४००)

हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन उन विशेष कालों की प्रमुख प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर किया गया है । इस प्रकार आदिकाल में वीर रस प्रधान रचनाओं का बाहुल्य था इसीलिए इसे वीरगाथा काल भी कहा जाता है । इस काल में पृथ्वीराज रासो, खुमान रासो तथा बीसलदेव रासो

अत्याधिक लोकप्रिय हुए । इसके अलावा सिद्ध-साहित्य और जैन साहित्य में भी प्रणयन हुए परन्तु वे रचनाएँ गौण प्रवृत्तियों के अन्तर्गत मानी जाती हैं ।

भक्तिकाल (१४०० - १७००)

भक्तिकाल में संत कवियों तथा सूफ़ी कवियों की रचनाएँ बहुत देखने को मिलती हैं । जहाँ सन्तों ने शान्त रस प्रधान भक्तिमय साहित्य प्रस्तुत किया, वहीं सूफ़ियों ने ज्ञानमार्गी तथा प्रेममार्गी भावनाओं को अपनी रचनाओं में दर्शाया । भक्तिकाल में तुलसीदास, सूरदास तथा कबीरदास जैसे महान कवि हुए और रामचरितमानस, सुरसागर एवं बिजक जैसी रचनाओं ने इस काल के साहित्य को सजाया ।

रीतिकाल (१७०० - १९००)

रीतिकाल में अलंकार, रीति-शैली तथा कलात्मकता का प्राधान्य था । मुगल साम्राज्य पूरी तरह स्थापित हो चुका था और पतन की ओर अग्रसर हो रहा था । वह सौंदर्योपासना का युग था । विलास के प्रति शासकों की बड़ी रूचि थी । इसी हेतु उनके दरबारी तथा अन्य कवि भी वासना की भावना से युक्त काव्य-रचना करते थे । अत: श्रृंगार रस से ओत-प्रोत साहित्य जनता के सामने आया । केशवदास चिन्तामणि तथा भूषण रीतिकाल के जाने-माने कवि थे । 'कविराज भूषण ' , 'कविप्रिया' एवं 'कविकुल कल्पतरु' आदि ग्रन्थ इस काल के महत्वपूर्ण ग्रन्थ रहे ।

आधुनिककाल (१९०० से अब तक)

आधुनिककाल व्यावसायिक क्रांति और सांस्कृतिक नवचेतना का काल है । मध्यकालीन सामन्ती व्यवस्था लुप्त होने से राजनीतिक , सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में भारतियों के दॄष्टिकोण में परिवर्तन हुआ । इसी से प्रेरित होकर आधुनिक साहित्य ने सिर उठाया । जनता में देश-प्रेम का जागरण हुआ । आधुनिक मुद्रण व्यवस्था से समाचार पत्र, पुस्तकें, पत्रिकाएँ, नाटक तथा उपन्यास आदि अधिक मात्रा में छपने लगे । ईसाइयों ने भी अपने धर्म का प्रचार हिन्दी में ही किया । गद्य ने ज़ोर पकड़ा , छायावाद तथा रहस्यवाद का जन्म हुआ । इस काल में भारतेन्दु, द्विवेदी, प्रेमचन्द, शुक्ल, प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा तथा अनेक उच्च कोटि के साहित्यकार देखे गए । सत्यार्थप्रकाश, प्रेमसागर, सुखसागर, भारत-भारती, गोदान आदि रचनाओं के साथ सैकड़ों साहित्यकारों की कृतियाँ हिन्दी में पाई जाती हैं ।

References : Hindi Society (Singapore), 2002; Rajnath Sharma Hindi Sahitya ka Itihaas

मोरीशस के हिंदी साहित्य पर सर शिवसागर रामगुलाम का प्रभाव |

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Submitted by jishnu on Fri, 09/09/2011 - 17:04 लेख
मोरीशस के हिंदी साहित्य पर सर शिवसागर रामगुलाम का प्रभाव |
मोरीशस के स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी सर शिवसागर रामगुलाम हिंद महासागर क्षेत्र के महान नेता एवं राजनीतिज्ञ थे | यह स्वाभाविक ही था कि उनके स्वतंत्रता संघर्ष तथा स्वतंत्रता के पश्चात् मोरीशस को कल्याणकारी राज्य बनाने के प्रयत्नों का प्रभाव हमारे मोरीशस के हिंदी साहित्य पर पड़ता | ये प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से साहित्य की सभी विधाओं पर देखा जा सकता है - कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध आदि | किन्तु इसमें दो मत नहीं कि रामगुलाम के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं विचारधारा का सबसे अधिक प्रभाव कविता पर पड़ा | डॉ. ब्रजेन्द्र भगत 'मधुकर' ने चाचा रामगुलाम पर सैकड़ों कविताएँ रची हैं | वे चाचा के भक्त एवं आत्मीय थे | स्वतंत्रता आन्दोलन के दिनों में मधुकर रामगुलाम के राजनीतिक जुटावों में उपस्थित होकर अपनी कविताओं को गाकर सुनाते थे | कवी ने उनको निकट से देखा और समझा है | अपनी 'मधुवाणी' पुस्तक में 'स्वीकारो श्रद्धांजलि ' अर्पित करते हुए उनके मानवीय गुणों का उदघाटन किया है | यथा –

"मोरीशस का भाग्य विधाता,

विरोधियों को गले लगाता |

निराश्रितों का आश्रयदाता जग,

सारा गौरव गुण गाता ||

स्वतंत्रता की समर भुनी में,

जित लिया संग्राम |

बना दिया इस देश को,

चाचा स्वर्गपुरी सुरधाम ||"

वास्तव में रामगुलाम सच्चे अर्थों में 'निराश्रितों के आश्रयदाता' थे और इस देश को 'स्वर्गपुरी' बनाने में जीवन पर्यन्त प्रयास करते रहे | यह सर्वविदित है कि चाचा रामगुलाम की सरकार ने वृद्धों, विधवाओं, बीमारों, मछुओं, बेकारों आदि के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था की थी |

जनार्दन कालीचरण ने अपनी कविता के माध्यम से चाचा के संघर्षमय जीवन पर प्रकाश डाला है | निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं –

"दिन-दुखी जनों का दर्द बाँटकर,

उनको साथी बनाया था |

चैन-आराम का महल छोड़कर,

संघर्ष को गले लगाया था ||"

कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम में गीता के 'भक्त', 'स्थितप्रज्ञ' तथा 'गुणातीत' जैसे गुणों को देखा है | इस सन्दर्भ में सोमदत्त बखोरी की ये पंक्तियाँ देखी –

"जो भी है मिलता वे लेते सभी |

फूलों की माला अरु फटकार भी ||

जो देना है, सो दे दो मिट अभी |

न ऐसा मिलेगा फिर कोई कभी ||"

मधुकर ने रामगुलाम को 'गीता गान सुनाने वाला' कहा है | इसका तात्पर्य यही है कि चाचा गीत के उपदेशों को जीने वालों में थे | कवी के ही शब्दों में –

"कभी न पीछे हटाने वाला |

सत्य न्याय पर मिटने वाला |

जीवन दान दिलाने वाला,

गीता गान सुनाने वाला ||"

मोरीशस के शीर्षस्थ कथाकार अभिमन्यु अनत ने चाचा रामगुलाम के समय के मोरीशस का चित्रण अपने उपन्यासों तथा कहानियों में किया है | यह शोध का विषय हो सकता है | स्वतंत्रता के पश्चात् वाला मोरीशस आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याओं से जूझने वाला मोरीशस था |

महेश रामजियावन तथा अस्तानंद सदासिंह जैसे नाटककारों ने अपने नाटकों में रामगुलाम के शासनकाल की विसंगतियों पर प्रकाश डाला है |

'और पसीना बहता रहा' उपन्यास में अभिमन्यु अनत ने मज़दूर नेता पं. हरिप्रसाद रामनारायण के कार्यों तथा सेवाओं का उल्लेख किया है |

वास्तव में चाचा के उदार दृष्टिकोण के कारण न केवल रामनारायण बल्कि सुखदेव विष्णुदयाल, रज़ाक मुहम्मद, पं. जगदम्बी जैसे नेता भी उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके | इसीलिए जब देश की आज़ादी का प्रश्न उठा तब ये लोग रामगुलाम को अपना सहयोग देने में पीछे न रहे |

स्थानीय लेखकों एवं कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है | इसीलिए उनकी रचनाओं में जहाँ सभी संस्कृतियों तथा धर्मों के प्रति आदर भाव रखने वाले रामगुलाम का चित्रण हुआ है, वहां मोरीशस को स्वतंत्रता दिलाने वाले देश भक्त रामगुलाम के भी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं | 'बेलरिव' की झोंपड़ी से लेकर 'रेज्वी' महल तक का रास्ता तय करने वाले राष्ट्रपिता रामगुलाम के महान कार्यों को साहित्यकार भला कैसे भूल सकते हैं ?

अंत में ऍन मिलकर सोमदत्त बखोरी के शब्दों में त्यागमूर्ति सर शिवसागर रामगुलाम को श्रद्धांजलि अर्पित करें –

"ऊँचा किया नाम अपना

और अपने देश का,

ऊँचा किया नाम पूर्वजों का

और उनके देश का |

इतिहास में अंकित होगा

स्वर्णाक्षर में सत्य अनोखा-

पूरी करके लम्बी यात्रा

कुली-पुत्र बना राष्ट्र-पिता |"

साभार - परिक्रमा डॉ. मुनीश्वरलाल चिंतामणि

सायंकालिन पाठशालाओं में हिन्दी की पढ़ाई का उद्देश्य

< निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान केमिटेन हिय को शूल >

हिन्दी हमारी मातृ भाषा है जो भारतीय मज़दूर उत्तर प्रदेश से तथा बिहारराज्यों से मॉरीशस लाये थे । उन में से लोग अपने साथ रामायणमहाभारत,हनुमान चालीसा, साथ-साथ कर्मकाण्ड की कुछ पुस्तकें भी लाये थे। दिनभर की नौकरी के बाद शाम के समय वे पेड़ों की छाया में मिट्टी के दीये जलाकर सत्संग किया करते थे। कुछ लोग रामायण के दोहे और चौपाइयाँछन्दतथा हनुमान चालीसा का कण्ठस्थ करते थे। १९०१ में जब महात्मा गांधी जी मॉरीशस आए तब उन्होंने भारतीयलोगों से आग्रह किया कि वे बच्चों को शिक्षित कराएँ। लोग संगठित हुए और बैठकाओं का निर्माण कियागया। शाम के समय बच्चे उन बैठकाओं में जाकर वर्णमाला सिखते थे तभी हिन्दी भाषा की पढ़ाई का श्रीगणेश हुआ। श्री वासुदेव बिसुनदयाल के अथक प्रयत्नों से उस समय की सरकारी प्राथमिक पाठशालाओं मेंहिन्दी की पढ़ाई को मान्यता दी गई।


सायंकालीन पाठशालाओं में हिन्दी भाषा का भविष्य उज्जवल है। आने वाली पीढ़ी को हिन्दी भाषा से प्रेम,लगन और श्रद्धा है। हिन्दी प्रेमीअध्यापकसरकार तथा हिन्दी प्रचारिणी सभा इस भाषा पर पूरा योगदान दे रहेहैं। भोजपूरी हिन्दी भाषा का स्रोत है। यह भाषा हमें नैतिकतानीतिनियमधर्मकर्म और मोक्ष की राह बतातीहै। हिन्दी एक मीठी भाषा है। यह भाषा बच्चों के दिलों में त्यागएकता और प्रेम लाती है। बच्चे हिन्दी औरभोजपूरी भाषा पढ़ कर परिवारसमाज और देश का नाम रोशन करते हैं।

हिन्दी भाषा पढ़ने से बच्चों में शिष्टाचार होती है। वे बड़ों का आदर और छोटों से प्यार करते हैं। बैठकाओं मेंहिन्दी का शिक्षण स्कूलोंकॉलेजों से अलग होती है। यहाँ पर बचपन से ही बच्चों को वृद्धों का आदर-सत्कारकरना सिखाया जाता है। घर पर आये मेहमान को आदर पूर्वक नमस्कार करना सिखाया जाता है। दादा जी,दादी जीचाचा जीनाना जीमामी जी से आए मेहमानों को सम्बोधित करना सिखाया जाता है। शिष्टाचारमनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। बिना शिष्टाचार के मनुष्य का जीवन अधूरा है। शिष्टाचार से ही मनुष्य केअच्छे और बुरे कर्मों की पहचान होती है। सायंकालीन पाठशालाओं में बच्चों के समक्ष शिष्टाचार सिखायाजाता है।

आज प्रोध्योगिकरण ने अध्यापक तथा छात्र के जीवन में नयी रोशनी लायी है। बच्चे केवल पुस्तकीय कार्य नहींबल्कि खोज कार्य भी करते हैं। कम्प्युटर ने मनुष्य का जीवन सहज और सफल बना दिया है। बच्चे कम्प्युटर परन केवल हिन्दी शब्दों पर कार्य करते हैं बल्कि हिन्दी का भी खोज कार्य करते हैं।


सायंकालीन पाठशालाओं में बच्चे भजन, कीर्तनसंगीत तथा रामायण के श्लोक और चौपाइयाँ सिखते हैं। धर्मऔर संस्कृति भी पढ़ते हैं। हमारे पूर्वजों ने खून पसीना एक करके अपनी भाषासंस्कृति और ज्ञान को जीवितरखा। हमें अपने धरोहर को पुष्पित करने के लिए इस भाषा को जीवित रखना होगा। इसी में हमारा गौरव है।यदि भाषा गयी तो संस्कृति भी गयी। यही कारण है कि बैठकाओं में हिन्दी शिक्षण स्कूलों और कॉलेजों सेअलग है। बच्चे संगीतोधर्म सिखकर अपने चरित्र का निर्माण करते हैं। यही उसका मार्ग दर्शक है।


हमारा समाज बहुभाषी है। हमें हमारी संस्कृति पर गर्व है। जब कोई त्योहार आता है तब सभी जाति के लोगआपस में मिठाई बाँटकर खाते हैं। बैठकाओं में बच्चों के समक्ष त्योहारों पर ज्यादा बल दिया जाता हैं।महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव जी का चित्र बनाकरकाँवर को सजाकर उनके प्रति पढ़ाई को और रूचिकरबनाया जाता हैं। दिवाली के अवसर पर तरह-तरह की मिठाइयाँ बाँटकरतन और मन की खुशी का मतलबदिखाया जाता हैं। त्योहार खुशियाँ लाती हैं, एकता लाता है। एकता में ही शक्ति है। बच्चों को ऐसी अच्छीअच्छी बातें सिखाकर उनके कोमल मन में प्रकाश की ज्योति जगाया जाता है।


अतः हिन्दी प्रचारिणी सभा इस मृदु भाषा के लिए कड़ी परिश्रम कर रही हैं। सायंकालीन पाठशालाओं से बच्चोंके शिक्षा की नई ज्योत जागृत होती है।

अच्छे अध्यापक के गुण

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस नाते उनके लिए कुछ ऐसे कर्तव्यनिर्धारित है जिसका पालन करना अति आवश्यक है। अध्यापक / गुरु ईश्वरका दूसरा रूप माना गया है। हमारे धर्म में तीन ऋण माने गये है। पितृ ऋण,ऋषि ऋण और देव ऋण। इन तीनों ऋणों को पूर्ण करने से मनुष्य का जीवनसफल हो जाता है। जब मनुष्य अपने माता-पिता की सेवा तन और मन सेकरता है तब वह पितृ ऋण से मुक्त होता है उसी प्रकार ऋषि ऋण तभी पूर्णहोता है जब विद्यार्थी शिक्षा अध्ययन कर अपने माता-पिता और अध्यापकको सम्मान देता है। प्राचीन काल में विद्यार्थी गुरु कुल में शिक्षा करते थे। वेसभी प्रकार से सफल होकर ही तथा गुरु दक्षिणा देकर गुरुकुल से लौटते थे। उस समय विद्यार्थी वेद, शास्त्र,पुराण तथा मानव मूल्य के ज्ञान से परिपक्व हो जाते थे। परन्तु आज स्थिति कुछ अलग है। आज की प्रणालीमें बच्चे गुरुकुल में शिक्षा अध्ययन न कर प्राथमिक और माध्यमिक में पढ़ने जाते हैं। अध्यापक के उत्तरदायित्वबनता है कि वे अपने बच्चों को सही शिक्षा, प्रेरणा, सहनशीलता, व्यवहार में परिवर्तन तथा मार्ग दर्शक प्रदानकरे, उनके भविष्य को उज्जवल बनाए।

एक आदर्श अध्यापक अच्छे और श्रेष्ठ गुणों से परिपूर्ण होता है। उन्हें अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए।जो अध्यापक समय का पालन करता है और योजना बनाकर विषय अनुसार ज्ञान प्रदान करता है वही सही गुरुकहलाता है। समय बड़ा बलवान होता है। संसार में सब कुछ खो जाने के बाद लौटाया जा सकता है परन्तुसमय जा कर पुनः वापस नहीं आता। अध्यापक को समय का पालन करना चाहिए। समय अनुसार अपनापाठ्यक्रम पूरा करने से बाद में उसी की प्रशंसा की जाती है। अगर विद्यार्थी जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ मेंबीत जाए तो जीवन पर्यन्त हाथ / पछताना पड़ जाएगा।


एक आदर्श गुरु में नम्रता और श्रद्धा होती है। इसीलिए कबीर जी ने कहा था कि ' ऐसी बाणी बोलिए मन काआपा खोय, अवरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय '


हिन्दी भाषा एक मधुर और मीठी भाषा है। एक अध्यापक को ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे बच्चे उन सेप्यार करे, उन्हें अपनी भावनाओं और मन की इच्छाओं को व्यक्त करने में कोई झिझक न हों। मृदु भाषी से हमसंसार को जीत सकते हैं परन्तु क्रोध, अहंकार, लोभ, मद से हमारी हार होती है। अध्यापक अपनी वाणी सेबच्चों का मन जीत ले तो बच्चे उन के हो जाते हैं। अध्यापक में धैर्य और सहनशीलता होनी चाहिए जिससे नकेवल बच्चे परन्तु आस-पास के लोग उन की प्रशंसा के पुल बांधे और उन से आकर्षित हो।

अध्यापक बच्चों के समक्ष स्वास्थ्य की बातें सिखाएं। खेल-कूद करने से बच्चे स्वस्थ रहते हैं। प्रतिदिन खेल-कूद, व्यायाम और संतुलित भोजन करने से मनुष्य का शरीर तंदुरुस्त रहता है। संतुलित भोजन खास-करशाकाहारी भोजन खाने से मन और दिमाग पर अच्छा असर होता है। मन पवित्र होता है, दिमाग चंचल नहींहोती। संतुलित भोजन शरीर में स्फुर्ति लाती है। अधिक मात्रा में सेब, दूध और अन्य फल खाने से त्वचा मेंनिखार आता है। प्रतिदिन पन्द्रह मिनट व्यायाम करने से शरीर में ताज़गी होती है और बाल भी लम्बे होते हैं।अध्यापक बच्चों को अन्तर और बाहर की सफ़ाई से अवगत कराए। हमारे शरीर में साठ प्रतिशत भाग पानी है।शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाने से शरीर अस्वस्थ हो जाते है इसीलिए ज्यादा से ज्यादा पानी पीने काप्रयत्न करें। स्नान कर के, साफ़ कपड़े, साफ़ जूते पहनकर पाठशाला आने से अच्छा ज्ञान मिलता है। अध्यापकबच्चों को सिखाए कि सम्पत्ति गयी तो कुछ न गया परन्तु स्वास्थ्य गयी तो सब कुछ चला गया।


अध्यापक बच्चों को धर्म, संस्कृति, संगीत, संध्या, हवन और धार्मिक त्योहार से अवगत कराए। त्योहार हिन्दू ,मुस्लिम, बौध, ईसाई के लिए खुशियाँ और प्यार लाता है। मॉरीशस एक बहुजातिय देश है जहाँ सभी जाति केलोग मिल-जुल कर रहते हैं। त्योहार रिश्तों के सम्बन्धों को मज़बूत बनाता है। बच्चों में हिन्दी भाषा से लगावपैदा करने की रूचि बनाए रखने के लिए कबीर के कुछ दोहे सिखाए। इन दोहों से कक्षा का श्री गणेश करेंजिससे बच्चे आकर्षित हों। रामायण की कथा सुनाकर श्री रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी , शत्रुघ्न तथा भरत के प्रेमको प्रदर्शित करने की कोशिश करें। श्री रामचन्द्र जी पुरुषोत्तम थे, सदा माता-पिता की आज्ञा का पालन करतेथे। बच्चों को आज्ञाकारी बनने की प्रेरणा रामायण से ही मिलती है। घर पर यज्ञ करने को प्रेरित करें। यज्ञ सेलाभ होता है। वायु शुद्ध होती है। अग्नि को जब प्रज्वलित करते हैं तो वह ऊपर की ओर उठता है उसी प्रकारबच्चे / मनुष्य अग्नि की तरह ऊँचाई के शिखर पर पहुँचते जाएँ। बच्चों को प्रातः और शाम को संध्या करने कोप्रेरित करें।

अध्यापक को अपने बच्चों को अनुशासन सिखाना चाहिए। व्यक्ति को अपने विकास, जीवन, समाज और राष्ट्रके विकास के लिए अनुशासन बहुत आवश्यक है। एक अनुशासित अध्यापक अपने बच्चों का मार्ग दर्शक होताहै। जब बच्चे शिक्षा अध्ययन करने के लिए योग्य हो जाते हैं तब उन का उपनयन संस्कार किया जाता है।अध्यापक अपने परिश्रम और तप से उन के चरित्र का निर्माण करता है। वे उन का प्रेरक होते हैं। अपनी श्रद्धाऔर विवेक से वे बच्चों के जीवन में ज्योति जलाता है जिससे परिवार, समाज और देश उन की प्रकाश सेचमकता रहे। बच्चे वे फूल होते हैं जिसकी सुगन्ध से सारा संसार सुगन्धित होता है।


अतः अध्यापक अपने संयम, सदाचार, आचरण, विवेक, सहनशीलता से बच्चों को महान् बनाते हैं। मनुष्य काजीवन बार बार नहीं मिलता इसीलिए मनुष्य अपने कर्तव्य से मुंह नहीं फिर सकता। अध्यापन एक उत्तम कार्यहै। अध्यापन कार्य से आशीर्वाद मिलता है और हमारा जीवन सफल हो जाता है।

My Hindi Exams Experience

It is a great opportunity to be able to have a blog on the website of Hindi Speaking Union. This will permit me to share my interests for the language and the rich Hindi Literature.

On a completely personal note, I would like to share my experience of studing hindi from the begginning.

1. Hindi Baitka

I was a small child, around 9 years old. My dad brought me to the 'Baitka' and I was given to fill in a registration form.

It was in my primary school itself. I was then brought to the 'Teesri Kaksha'. Fortunately for me, I got the opportunity to sit with my friends.

Then with a soft tone the behenji said "Read on the passage, you know how to read na?". I stood up and read a paragraph for the topic under study in the class.

2. CPE Level Hindi Examinations

Since Standard 1 till CPE, one has to study an Oriental Language (Hindi/ Urdu etc.). There was the system of ranking at that time.

Furthermore, there were seats reserved at the Mahatma Gandhi Institute Secondary School (Moka) for best students ranked in the field of

Oriental languages.

It is my pure luck and destiny that I got the bestest Guru Ji during my CPE level who was a real guide in my life.

Owing to his excellent pedagogical style, incredible sense of humour and disciplined/strict way of teaching hindi, I developed love for the language,

and passed the hindi exams with flying colours. In fact, I used to come first or second at each of the Hindi exams.

3. SC and HSC Level

Given I was ranked 13th at National Level, I got a seat at MGI, as planned... At the star school, I got to meet students who are best in the oriental languages. It was a pleasure to stay with the brightest. My friends came first in Marathi, Tamil, Telegu, Urdu, Hindi etc... The wonderful study environment at MGI was like a boon.

At the same time, in form 3, in what used to be the old computer lab, I had my first experience with Windows 98. And since then,

I started to explore my potential with the world of computers. I kept a keen interest in it. Eventually, my interest in hindi declined a bit. At form 5, I could not

enter the Hindi classes as the timetable would clash with those of my Computer Studies classes. Naturally I would go for the computer labs.

As a matter of shame, I got distinction 2 in Hindi at form V level. I was embarassed, furious. I started a sort of 'rebellion' within myself.

Then came HSC exams. I were to compete in the Economics field. It was the challenge. I worked hard in each of my subject.

But for Hindi Sub level, I worked even harder, yes rebellion. I was determined to give my best shot and to alleviate myself of the shameful form 5 results.

HSC Results: I came first in Hindi Sub AS-level in Mauritius; Objectif attained! This result also helped me to be ranked at national level in Economics and obtain a bursary at the University of Mauritius

4. Hindi Sahitya Exams (Allahbad)

I studied till Uttamma Second Level. I dropped and did not complete the final year. This was a decision I took because I was utterly disspointed with the results I obtained despitemy best performance. However I appreciated a lot the classes of Uttama I.

I also got the opporunity, in 2005 to teach at Baitka. It was great to be in the shoes of 'Guru Ji'!


Here we are today: blending my newly developed Computing skills with that of the learnt Hindi knowledge acquired till 2006.


मारीच का वह पहला कवि by Ramdeo Dhoorudhur

यह उस समय की बात है जब गोरे भारतीयों को ठग करगुलामी करने के लिए मॉरीशस लाते थे । उनका कहना थाकि मॉरीशस में पत्थर उलटने से सोना मिलती है । यह सुनकर एक युवक के मन में इस देश को देखने की इच्छा जागृतहुई । वह चोरी-छिपे मॉरीशस जाने वालों के बीच पहुँच गया । जहाज़ चढ़ने पर उसे ज्ञात हुआ कि लोग गोरों के हाथोंकितनी यातनाएँ सहते हैं । उस युवक की मित्रता एक वृद्धासे हुई जिसे वह नानी कहने लगा और उसी के साथ रहने लगा । वह युवक नानी के साथबोशाँ गाँव में रहता था । उस गाँव को पहले मछुआ घाट कहते थे । उस युवक को लोगजतिन नाम से जानते थे । वह प्रतिदिन मज़दूरी करने जाता । वापसी में नदी किनारे बैठारहता । एक दिन जब वह नदी के तट पर बैठा था तो अचानक बाढ़ उतर आई । नदी केबीच चट्टान पर कुछ औरतें कपड़े धो रही थीं । वह नदी में कूद पड़ा पर पास आने परवहाँ कोई नहीं था । दरअसल वह बाढ़ मायावी था । जब जतिन घर नहीं लौटा तोगाँववाले उसे ढूँढने निकले । नदी किनारे उसका सामान पड़ा था । लोगों ने समझा किउसने अपनी जान दे दी । उसके सामान में एक कागज़ और कलम भी था जिसमें उसनेकविता लिखी थी । नानी पढ़ सकती थी । वह जतिन की पहले लिखी हुई तमामकविताएँ संभाल कर रखी थी । किसी तरह नानी ने उन कविताओं को छापने के लिएभारत भेजा । नानी को इस बात की खुशी थी कि भारत के लोगों को जतिन कीकविताओं द्वारा यह मालूम होगा कि मॉरीशस में पहुँचे मज़दूरों की दशा कितनी दयनीयहै ।

मॉरीशस की लोक कथाएँ (2006), मारीच का वह पहला कवि, स्टार पब्लिकेशंस प्रालि. 415 - बी, आसफ अली रोड, नईदिल्ली-110 002 भारत

मॉरीशस में हिंदी

मॉरीशस में हिंदी भाषा का इतिहास लगभग डेढ़ सौ वर्षों का है। स्वतंत्रतापूर्व काल में यह भाषा बीज रूप में थी। भोजपुरी बोली के माध्यम से हिंदी विकसित भाषा को करने में भो तो का विशेष योगदान रहा है। खेतों में कड़ी धूप में गूँजने वाले लोक गीतों में, शाम की "संध्या" में, रामायण-गान में, त्योहारों में, हर कही यह भाषा अबाध्य रूप से बढ़ती चली गई। बैठकाओं में हिंदी भाषा का अध्ययन-अध्यापन होने लगा। भारतीय आप्रवासियों ने अपनी भाषा तथा संस्कृति की शिक्षा को ही अपने बच्चों के उद्वार का उचित मार्ग माना। 1901 में महात्मा गांधी जी की प्रेरणा से ही भारतीय आप्रवासी अपने बच्चों को शिक्षा तथा राजनीति के क्षेत्र में अग्रसर करा पाए।

उन्हीं के कहने पर 1907 में मणिलाल डॉक्टर मॉरीशस आए। उन्होंने जी जान से मज़दूरों की सेवा की। भारत देश से मंगाई जाने वाली पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ भारतीय आप्रवासियों को हिंदी के और समीप लाने में सहायक बनी तथा उन्ही से प्रेरणा ग्रहण करके हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगी। इनसे एक ओर जहाँ सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं के विरूद्व संघर्ष आरंभ हुआ, वहीं मॉरीशसीय हिंदी साहित्य को अभिव्यक्ति हेतु नवीन मंच प्राप्त हुआ। मॉरीशस मित्र, आर्य-पत्रीका,नव-जीवन आदि पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भारतीय हिंदी साहित्यकारों से लोग परिचित होते गए और मॉरीशस के हिंदी साहित्यकारों को अपना अस्तित्व मिला। शैक्षिक, धार्मिक तथा साहित्यिक संस्थाएँ उभरी और हिंदी का प्रचार-प्रसार ज़ोर-शोर से होने लगा। इसमें आर्य समाज, सनातन धर्म तथा हिंदी प्रचारिणी सभा के साथ ही अन्य कई संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है। इस प्रकार मॉरीशस में पत्र-पत्रिकाओं, बैठकाओं तथा संस्थाओं के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ। 1954 के मार्च महीने से पूर्ण रूप से हिंदी भाषा की पढ़ाई पाठशालाओं में आरंभ हो गई।

आज मॉरीशस में शिक्षा, साहित्य, मीडिया आदी क्षेत्रों में हिंदी भाषा का मुख्य स्थान है। शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी भाषा को उचीत स्थान मिला है। प्राथमिक, माध्यमिक तथा विश्वविधालय के स्तर पर हिंदी भाषा एवं साहित्य की पढ़ाई होती है। स्कूलों तथा कॉलेजों में हिंदी से संबंिधत शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं ताकि छात्रों के बीच हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार हो सके और वे इसके प्रति अपनी रूचि दिखाएँ। एच.एस. सी. (Higher School Certificate) में हिंदी की परीक्षा में प्रथम स्थान पर आने वाले छात्रों को छात्रवृति भी दी जाती है ताकि वे हिंदी की उच्च शिक्षा अच्छे विश्वविधालयों में ग्रहण कर सकें। मॉरीशस विश्वविधालय एवं महात्मा गांधी संस्थान के सहयोग से बी ए,एम ए, पी जी सी ई, एम फ़िल एवं पी.एच.डी. की पढ़ई भी होती है। महात्मा गांधी संस्थान में हिंदी छात्रों द्वारा हिंदी सप्ताह आयोजित करने की प्रथा भी चल पड़ी है।

मॉरीशसीय साहित्य में हिंदी में ही सब से अधिक रचनाएँ उपलब्ध हैं। कविता, उपन्यास, कहानी, लधु कथा, निबंध, आलोचना आदि विधाओं में प्रकाशित अनेक रचनाएँ उपलब्ध हैं। कॉलेजों, मॉरीशस विश्वविधालय तथा कुछ भारतीय विश्वविधालयों में मॉरीशसीय रचनाओं का अध्यापन हो रहा है। भारत के बाद मॉरीशस ही वह देश है जहाँ सब से अधिक हिंदी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। मॉरिशस के गणमान्य साहित्यकारों ने ही हिंदी को स्थानीय तथा अंतराष्ट्रीय मंच में सम्मान दिलाया हैं। आज भी रचनाएँ रची जा रही हैं। युवा लेखकों को भी साहित्यिक गतिविधियों एवं प्रतियोगिताओं में भाग लेने तथा साहित्य सृजन करने के अवसर भी दिए जा रहे हैं।

मीडिया के क्षेत्र में भी मॉरीशस में हिंदी भाषा का एक अलग स्थान है। रेडियो से लेकर टीवी तथा इंटरनेट में भी हिंदी का प्रचार-प्रसार ज़ोर-शोर से हो रहा है। एम.बी.सी. के रेडियो तथा टीवी चैनलों में हिंदी समाचार प्रस्तुत किए जाते हैं। साथ ही साथ मनोरंजन, संस्कृति, धर्म, समाज, शिक्षा आदि विषयों पर भी हिंदी कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। हिंदी को वैश्विक स्तर पर एक महान भाषा के रूप में स्थान दिलाने के लिए बॉलिवुड का भी मुख्य स्थान है। इसी कारण अहिंदी भाषियों की रूची हिंदी सीखने की ओर बढ़ रही है।मॉरीशस में भी हिंदी गानों, फ़िल्मों,धारावाहिकों तथा अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से हिंदी भाषा के प्रति लोगों की रूचि बढ़ती जा रही है।

हिंदी भाषा के संवर्धन में मॉरीशस की अनेक संस्थाओं की अहम भूमिका रही है। ये संस्थाएँ हिंदी को बढ़ावा देने हेतु अनेक कार्यक्रम आयोजित करती है। कुछ संस्थाओं के नाम इस प्रकार है – हिंदी संगठन, विश्व हिंदी सचिवालय, हिंदी प्रचारिणी सभा, महात्मा गाँधी संस्थान, आर्य सभा मॉरीशस, इंिदरा गाँधी सांस्कृतिक केंद्र, हिंदी लेखक संध आदि। इन संस्थाओं ने हिंदी भाषा को शैक्षणिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक रूप से प्रचारित किया है। हिंदी संगोष्ठियों तथा अंतराष्ट्रय कार्यक्रमों के आयोजन के साथ ही हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन भी इनके द्वारा होते आए हैं। सुमन, विश्व हिंदी समाचार, विश्व हिंदी पत्रीका, आर्योदय, दर्पण, वसंत, पंकज, भाल-सखा आदि पत्रिकाओं में हिंदी से संवंिधत रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं।

मॉरीशस में पिछले डेढ़ सौ वर्षों के अपने इतिहास में जिस प्रकार से हिंदी भाषा ने प्रगति की है उससे यह निश्चित ही है कि इसका प्रचार-प्रसार भविष्य में भी होता रहेगा। मॉरिशस में रोज़गार के लिए भी हिंदी के क्षेत्र में अनेक उपक्षेत्र हैं जैसे शिक्षा, मीडिया, प्रशासन आदि। स्कूलों और कॉलेजों के साथ ही विश्वविधालय में हिंदी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में हर वर्ष वृद्वि होती जा रही है। हिंदी से संबंिधत गतिविधियों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों की संख्या भी संतोषजनक है। छात्र गण हिंदी-टंकन कार्य में भी रूचि दिखा रहे हैं। अनेक मॉरीशसीय हिंदी ब्लॉग भी उपलब्ध कराए गए हैं जिनके माध्यम से शिक्षक, छात्र गण एवं हिंदी प्रेमी एक ही मंच पर अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं और अपनी रचनाओं को भेजकर हिंदी साहित्य में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मॉरीशस में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।